Happy Independence Day
🌤️
--Bhopal, India

PlayBreaking News

19 दिन मर्चुरी में पड़ा रहा मासूम नवजात का शव, मानवाधिकार आयोग के संज्ञान के बाद 20वें दिन अंतिम संस्कार

जिला अस्पताल की मर्चुरी में 19 दिन से रखे नवजात के शव को मानवाधिकार आयोग के संज्ञान के बाद 20वें दिन परिजनों को सौंपा गया। परिवार ने डॉक्टर पर लापरवाही के गंभीर आरोप लगाए।
Follow on Google News
19 दिन मर्चुरी में पड़ा रहा मासूम नवजात का शव, मानवाधिकार आयोग के संज्ञान के बाद 20वें दिन अंतिम संस्कार
फाइल फोटो

सीहोर। जिस मासूम ने जन्म के बाद अभी दुनिया को ठीक से देखा भी नहीं था, उसके नन्हे शरीर को जिंदगी की जंग हारने के बाद भी अंतिम सफर के लिए 19 दिनों तक इंतजार करना पड़ा। सीहोर जिला अस्पताल की मर्चुरी में रखे नवजात के शव का मामला आखिरकार 20वें दिन तब खत्म हुआ, जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के संज्ञान में मामला पहुंचा। आयोग की दखल के बाद अस्पताल और प्रशासनिक अमले में हलचल मची और कागजी औपचारिकताएं पूरी कर शव परिजनों को सौंप दिया गया। इसके बाद परिवार ने नम आंखों से मासूम का अंतिम संस्कार किया।

30 जून को जन्मी थी बच्ची, कम वजन के कारण एसएनसीयू में भर्ती

मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर ग्राम सीलखेड़ा निवासी मजदूर शिवनारायण की पत्नी सविता ने 30 जून को एक बच्ची को जन्म दिया था। जन्म के समय नवजात का वजन कम होने के कारण उसे सीहोर जिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में भर्ती कराया गया। परिवार को उम्मीद थी कि अस्पताल में बेहतर इलाज से उनकी बच्ची स्वस्थ होकर घर लौटेगी, लेकिन कुछ ही दिनों में हालात बिगड़ते चले गए।

परिजनों का आरोप-समय पर रेफर नहीं किया गया

परिजनों का आरोप है कि बच्ची की हालत लगातार खराब हो रही थी और वे उसे निजी अस्पताल में ले जाना चाहते थे। परिवार के मुताबिक एसएनसीयू में तैनात डॉक्टर जयप्रकाश परमार से बच्ची को रेफर करने और डिस्चार्ज करने का आग्रह किया गया, लेकिन कथित तौर पर उनकी बात नहीं मानी गई। परिजनों का कहना है कि यदि समय रहते बेहतर इलाज के लिए बच्ची को दूसरी जगह ले जाने दिया जाता तो शायद उसकी जान बच सकती थी। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

Featured News

मां का दर्द-बच्ची को देखने जाती तो डांटकर बाहर कर देते थे

मासूम की मौत के बाद मां सविता का दर्द शब्दों में बयां करना मुश्किल है। उनका आरोप है कि जब भी वह अपनी बच्ची को देखने या उसे दूध पिलाने एसएनसीयू में जाती थीं, तो डॉक्टर और स्टाफ उन्हें डांटकर बाहर कर देते थे। उन्हें बच्ची की वास्तविक स्वास्थ्य स्थिति की जानकारी भी ठीक से नहीं दी जाती थी। एक मां के लिए इससे बड़ी पीड़ा क्या होगी कि उसकी अपनी संतान अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही हो और उसे उसके हालात की सही जानकारी तक न मिले।

मजदूरी कर जुटाए 80 हजार से एक लाख रुपए, फिर भी नहीं बची जान

शिवनारायण मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करते हैं। परिवार के अनुसार बच्ची के इलाज के दौरान उन्होंने अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च किया। पिता का कहना है कि दवाइयों और इलाज पर करीब 80 हजार से एक लाख रुपए तक खर्च हो गए। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के लिए इतनी बड़ी रकम जुटाना आसान नहीं था, लेकिन बेटी की जिंदगी बचाने की उम्मीद में उन्होंने हर संभव प्रयास किया। अंततः 24 जुलाई को इलाज के दौरान मासूम ने दम तोड़ दिया।

ये भी पढ़ें: भोपाल में टीका लगने के बाद 2 महीने की मासूम की मौत, परिजनों ने डॉक्टर पर लापरवाही का लगाया आरोप

इंसाफ की मांग पर शव लेने से किया इनकार

बच्ची की मौत के बाद परिवार ने शव लेने से इनकार कर दिया। परिजनों की मांग थी कि जिस डॉक्टर पर वे लापरवाही का आरोप लगा रहे हैं, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए और मामले की निष्पक्ष जांच हो। परिवार ने कलेक्टर बालागुरु के., पुलिस अधीक्षक सोनाक्षी सक्सेना और कोतवाली थाने में आवेदन देकर न्याय की गुहार लगाई। इसके बाद नवजात का शव अस्पताल की मर्चुरी में ही रखा रहा।

सीहोर में पहली बार 19 दिन तक मर्चुरी में पड़ा रहा नवजात का शव

यह मामला इसलिए भी बेहद गंभीर बन गया क्योंकि परिजनों के अनुसार जिले में ऐसा पहला मामला सामने आया, जिसमें किसी नवजात का शव 19 दिनों तक अंतिम संस्कार के इंतजार में अस्पताल की मर्चुरी में रखा रहा। एक तरफ परिवार न्याय और कार्रवाई की मांग पर अड़ा था, वहीं दूसरी तरफ मासूम का शव ठंडे कमरे में अपने अंतिम सफर की प्रतीक्षा करता रहा। यह स्थिति अस्पताल व्यवस्था, प्रशासनिक संवेदनशीलता और जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।

Breaking News

मानवाधिकार आयोग के संज्ञान से प्रशासन में मची हलचल

मामले की जानकारी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य और बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो तक पहुंची। उन्होंने मामले को गंभीर बताते हुए त्वरित संज्ञान और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही। आयोग की दखल की जानकारी सामने आते ही प्रशासनिक और अस्पताल प्रबंधन में हलचल तेज हो गई।

20वें दिन परिजनों को सौंपा गया शव, हुआ अंतिम संस्कार

मानवाधिकार आयोग के संज्ञान के बाद जिला अस्पताल प्रबंधन ने आनन-फानन में आवश्यक कागजी प्रक्रिया पूरी की। आखिरकार 20वें दिन मासूम का शव उसके परिजनों को सौंप दिया गया। जिस बच्ची को परिवार ने करीब एक महीने पहले जिंदगी की उम्मीद के साथ अस्पताल में भर्ती कराया था, वही बच्ची अब उनके हाथों में निर्जीव होकर घर लौटी। परिजनों ने भारी मन और नम आंखों से उसका अंतिम संस्कार किया।

ये भी पढ़ें: मुंबई के नेवी नगर में नौसेना कर्मी, पत्नी और 2 बच्चों की मौत, हत्या-आत्महत्या की गुत्थी में उलझी पुलिस

अब जांच और जवाबदेही पर नजर

मामला सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि नवजात की मौत के पीछे वास्तविक कारण क्या था, क्या इलाज में किसी स्तर पर लापरवाही हुई और परिवार के आरोपों में कितनी सच्चाई है। इन सभी सवालों का जवाब निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है। फिलहाल मासूम को तो अंतिम मुक्ति मिल गई, लेकिन उसके माता-पिता के मन में उठ रहे सवालों और न्याय की उम्मीद का जवाब मिलना अभी बाकी है।

Sunil Sharma
By Sunil Sharma

सुनील शर्मा, सीहोर जिला ब्यूरो, पीपुल्स समाचार। ढाई दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। दैनिक भास्कर, पत्र...Read More

icon

Latest Posts