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सबरीमाला मंदिर विवाद :सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं कर सकते! वकील के सवाल पर सु्प्रीम कोर्ट का जवाब

सुनवाई के दौरान इंदिरा जयसिंह ने कहा कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला अभी भी लागू है और उस पर कोई रोक नहीं है। इसके बावजूद महिलाओं को मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जा रहा है
सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं कर सकते! वकील के सवाल पर सु्प्रीम कोर्ट का जवाब

नई दिल्ली। केरल के सबरीमाला मंदिर समेत अन्य धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म की मूल भावना को कमजोर नहीं किया जा सकता। यह टिप्पणी वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह की दलीलों के जवाब में आई।

वकील : SC के फैसले के बावजूद महिलाओं को एंट्री नहीं मिल रही

सुनवाई के दौरान इंदिरा जयसिंह ने कहा कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला अभी भी लागू है और उस पर कोई रोक नहीं है। इसके बावजूद महिलाओं को मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जा रहा है, जो कि कानून के पालन में कमी को दर्शाता है। उन्होंने यह भी कहा कि कोर्ट इस मामले की पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है, लेकिन यह तय करना कि किसी धर्म में क्या जरूरी है और क्या नहीं, यह अदालत का काम नहीं बल्कि धर्म का विषय है।

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जस्टिस नागरत्ना- वर्तमान को समझने से पहले अतीत को जानना जरूरी

इसके जवाब पर जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि भारत की सभ्यता, परंपरा और धार्मिक इतिहास को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 भी इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से जुड़े हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि वर्तमान को समझने के लिए अतीत को समझना जरूरी है, और इतिहास को पूरी तरह नजरअंदाज करके कोई नई शुरुआत नहीं की जा सकती।

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जयसिंह का जवाब

सीनियर वकील जयसिंह ने इस पर जवाब देते हुए कहा कि इस मुद्दे पर बहस हो सकती है और समाज को नए दृष्टिकोण से भी देखा जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं को 10 से 50 साल की उम्र के बीच मंदिर में प्रवेश से रोकना उनके जीवन के एक बड़े हिस्से से उन्हें वंचित करना है, जो साफ तौर पर भेदभाव है।

पुरूष बिना रोक- टोक के दर्शन कर रहे- वकील जयसिंह

सुनवाई के दौरान उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अगर किसी अनुसूचित जाति की महिला को मंदिर में प्रवेश से रोका जाता है, तो क्या यह संविधान के अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन) का उल्लंघन नहीं है। उन्होंने कहा कि सभी पुरुषों को बिना किसी जातिगत रोक के प्रवेश मिलता है, जबकि महिलाओं पर पाबंदी है, जो समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।

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7 अप्रैल से चल रही मामले की सुनवाई

जयसिंह ने दो महिलाओं बिंदु और कनक दुर्गा का उदाहरण भी दिया, जिन्होंने पहले के कोर्ट आदेश के बाद मंदिर में प्रवेश किया था। उनके दर्शन के बाद विरोध हुआ और मंदिर के शुद्धिकरण की बात भी उठी, जो इस विवाद की गंभीरता को दिखाता है।
इस मामले की सुनवाई 7 अप्रैल से जारी है, जिसमें केंद्र सरकार ने धार्मिक परंपराओं के सम्मान की बात करते हुए महिलाओं के प्रवेश का विरोध किया है।

Aakash Waghmare
By Aakash Waghmare

आकाश वाघमारे | MCU, भोपाल से स्नातक और फिर मास्टर्स | मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर के तौर पर 3 वर्षों का क...Read More

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