भोपाल :बिल्डर्स के भरोसे ‘स्लम फ्री भोपाल’ का नया प्रयोग: 38 साल बाद फिर नई रणनीति

शाहिद खान, भोपाल। राजधानी को स्लम फ्री सिटी बनाने की कवायद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। करीब चार दशक से चल रही कोशिशों के बावजूद लक्ष्य अधूरा रहने के बाद अब नगर निगम ने सरकारी खर्च के बजाय निजी डेवलपर्स के भरोसे शहर को झुग्गीमुक्त बनाने की रणनीति तैयार की है। इस मॉडल में झुग्गी बस्तियों की जमीन पर कमर्शियल कॉम्पलेक्स विकसित किए जाएंगे, जबकि वहीं आसपास ईडब्ल्यूएस (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) के लिए बहुमंजिला फ्लैट बनाए जाएंगे।
राजधानी को स्लम फ्री सिटी बनाने की कवायद के तहत अब बेशकीमती जमीन को झुग्गी बस्तियों से मुक्त कराने की तैयारी तेज हो गई है। शहर की करीब 650 एकड़ प्राइम जमीन, जिसकी कीमत लगभग 10 हजार करोड़ रुपए आंकी गई है, को चरणबद्ध तरीके से खाली कराकर निजी डेवलपर्स को सौंपने की रणनीति पर काम चल रहा है। झुग्गी बस्तियों का सर्वे पूरा हो चुका है और अब शिफ्टिंग व डेवलपमेंट का खाका अंतिम रूप में है।
सर्वे पूरा, अब विस्थापन का काम होगा
निगम ने पहले चरण में मांडवा बस्ती, ओम नगर, राजीव नगर और भीमनगर समेत प्रमुख क्षेत्रों का सर्वे पूरा कर लिया है। इसमें झुग्गियों की संख्या, रहवासियों का डाटा और जमीन की उपलब्धता का आकलन किया गया। इसी आधार पर अब यह तय किया जा रहा है कि कितने परिवारों को पुनर्वासित करना होगा और कितनी जमीन डेवलपमेंट के लिए उपलब्ध होगी।
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योजना: लोगों को फ्लैट्स में बसाया जाएगा
योजना के तहत झुग्गियों को हटाकर रहवासियों को पास ही विकसित किए जाने वाले मल्टी स्टोरी ईडब्ल्यूएस फ्लैट्स में बसाया जाएगा। इसके बाद खाली होने वाली जमीन निजी बिल्डर्स को दी जाएगी, जहां कमर्शियल कॉम्पलेक्स और अन्य प्रोजेक्ट विकसित किए जाएंगे। पुनर्वास स्थलों पर सड़क, पानी, बिजली और सीवेज जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी डेवलपर्स को ही सौंपी जाएगी।इनसाइड स्टोरी
650 एकड़ जमीन पर 72 झुग्गी बस्तियों का कब्जा
निगम रिकॉर्ड के अनुसार शहर में 70 से अधिक झुग्गी बस्तियां करीब 650 एकड़ जमीन पर फैली हुई हैं। इन जमीनों की औसत कीमत करीब 3500 रुपए प्रति वर्गफीट है, जिससे एक एकड़ की कीमत लगभग 15.40 करोड़ रुपए बैठती है। कुल मिलाकर यह जमीन करीब 10 हजार करोड़ रुपए की है और शहर के कई प्राइम लोकेशन पर स्थित है।
38 साल से अधूरा सपना, अब नई रणनीति
शहर को झुग्गीमुक्त बनाने की शुरुआत 1984 में हुई थी, लेकिन अब तक स्थायी समाधान नहीं निकल सका। 2008 में जेएनएनयूआरएम के तहत हजारों मकान बनाए गए, इसके बावजूद नई बस्तियां बसती रहीं। वर्तमान में भी प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत हजारों फ्लैट बनाए जा रहे हैं, लेकिन चुनौती बरकरार है।
सबसे बड़ी चुनौती, स्थायी पुनर्वास
पिछले अनुभवों में सामने आया है कि पुनर्वास के बाद भी कई लोग वापस झुग्गियां बसाने लगते हैं। ऐसे में इस बार प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि पुनर्वास स्थायी और प्रभावी हो। फिलहाल, सर्वे पूरा हो चुका है और रणनीति तैयार है। अब देखना यह है कि स्लम फ्री सिटी का यह नया प्रयोग जमीन पर कितना सफल होता है।











