भोजशाला विवाद:हाईकोर्ट में तीखी बहस, अधिवक्ता मेनन बोलीं- यह जनहित नहीं, सिविल मामला; निचली अदालत तय करे हक

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में भोजशाला विवाद को लेकर मंगलवार को हुई सुनवाई अहम मोड़ पर पहुंच गई। हस्तक्षेपकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन ने विस्तृत और क्रमबद्ध तरीके से अपने तर्क रखते हुए साफ कहा कि यह मामला जनहित याचिका के दायरे में नहीं आता बल्कि एक सिविल विवाद है जिसका फैसला साक्ष्यों के आधार पर निचली अदालत में होना चाहिए। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि इस मामले को संवैधानिक सिद्धांतों और स्थापित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही देखा जाए।
संवैधानिक अधिकारों का दिया हवाला
सुनवाई के दौरान मेनन ने अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों का संतुलन बनाए रखना न्यायालय की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि किसी एक समुदाय के धार्मिक मुद्दे को जनहित का रूप देना उचित नहीं है क्योंकि इससे दूसरे पक्ष के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। उनके मुताबिक अदालत को दोनों पक्षों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाकर निर्णय लेना चाहिए।
जनहित याचिका के दायरे पर उठाए सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता ने अपने तर्कों में यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के विवाद को जनहित याचिका के रूप में पेश करना विधिसंगत नहीं है। उनका कहना था कि जब मामला सीधे तौर पर संपत्ति, धार्मिक अधिकार और उपयोग से जुड़ा हो तो उसे सिविल कोर्ट के माध्यम से ही तय किया जाना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि अदालत को इस मामले में साक्ष्यों के आधार पर ही अंतिम निर्णय लेने देना चाहिए न कि इसे जनहित के रूप में देखा जाए।
राज्य और एएसआई के बदलते रुख पर सवाल
सुनवाई के दौरान मेनन ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और राज्य सरकार के रुख पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अलग-अलग समय पर दोनों पक्षों ने विरोधाभासी बयान दिए हैं। कभी इस स्थल को ‘न मंदिर, न मस्जिद’ बताया गया तो अब इसे केवल मंदिर कहा जा रहा है। उनके मुताबिक सरकार का ऐसा बदलता रुख न्यायिक प्रक्रिया में स्थिरता को प्रभावित करता है और यह विधि के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
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आगे भी जारी रहेगी सुनवाई
मंगलवार को एक पक्ष की बहस पूरी हो चुकी है, जबकि अब अन्य पक्ष अपनी दलीलें पेश करेंगे। अदालत में इस मामले की सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस विवाद पर और भी महत्वपूर्ण कानूनी तर्क सामने आ सकते हैं जिससे केस की दिशा तय होगी।












