CG NEWS: रायपुर स्काईवॉक फिर विवादों में: 8 साल बाद भी अधूरा, खुले में पड़े-पड़े बर्बाद हुए 5 करोड़ के लिफ्ट-एस्केलेटर!

PREM KUMAR RAIPUR रायपुर का बहुचर्चित स्काईवॉक प्रोजेक्ट एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। करीब 8 साल पहले शुरू हुई यह परियोजना आज भी अधूरी है, जबकि इसमें लगने वाले लगभग 5 करोड़ रुपए के लिफ्ट और एस्केलेटर वर्षों से खुले आसमान के नीचे पड़े-पड़े खराब हो गए हैं। करोड़ों रुपए की इस कथित लापरवाही ने न केवल सरकारी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि जनता के पैसे के दुरुपयोग को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है।
8 साल बाद भी अधूरा स्काईवॉक
रायपुर शहर में ट्रैफिक दबाव कम करने और पैदल यात्रियों को सुरक्षित आवागमन की सुविधा देने के उद्देश्य से वर्ष 2016-17 में स्काईवॉक परियोजना की शुरुआत की गई थी। उस समय इसकी लागत 42.55 करोड़ रुपए तय की गई थी, लेकिन समय के साथ डिजाइन और तकनीकी बदलावों के कारण लागत बढ़कर करीब 77 करोड़ रुपए तक पहुंच गई। इसके बावजूद परियोजना आज तक पूरी नहीं हो सकी है।
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5 करोड़ के उपकरण खुले में पड़े रहे
स्काईवॉक में लगने वाले लिफ्ट और एस्केलेटर का सामान वर्षों पहले खरीद लिया गया था। जानकारी के अनुसार करीब 5 करोड़ रुपए मूल्य के ये उपकरण पिछले पांच साल से अधिक समय से शहीद वीर नारायण सिंह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम परिसर में खुले में रखे हुए हैं। लगातार बारिश, धूल और मौसम की मार के कारण इनके खराब होने की आशंका जताई जा रही है।
निर्माण अधूरा तो खरीदारी क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब स्काईवॉक का निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ था तो करोड़ों रुपए के उपकरणों की खरीदारी क्यों की गई? यदि खरीदारी आवश्यक थी तो उनके रखरखाव की जिम्मेदारी किस अधिकारी या एजेंसी की थी? सूत्रों के अनुसार पुराने उपकरणों के खराब होने के बाद नए उपकरणों का ऑर्डर भी दिया गया है, जिससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
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राजनीति भी गरमाई
परियोजना की शुरुआत भाजपा शासनकाल में तत्कालीन लोक निर्माण मंत्री राजेश मूणत के कार्यकाल में हुई थी। वर्ष 2018 में कांग्रेस सरकार बनने के बाद अनियमितताओं के आरोप लगाते हुए काम रोक दिया गया था। वर्ष 2023 में भाजपा सरकार की वापसी के बाद परियोजना का निर्माण फिर शुरू हुआ। अब कांग्रेस नेताओं विकास उपाध्याय और अमरजीत भगत ने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए इसे करोड़ों रुपए की लापरवाही बताया है।
सरकार का पक्ष
लोक निर्माण मंत्री अरुण साव का कहना है कि परियोजना का निर्माण कार्य टेंडर की शर्तों के अनुरूप किया जा रहा है। सरकार का दावा है कि गुणवत्ता और पारदर्शिता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा तथा परियोजना को जल्द पूरा करने के प्रयास जारी हैं।
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जनता पूछ रही- जिम्मेदार कौन?
करीब एक दशक से अधूरी पड़ी स्काईवॉक परियोजना अब केवल निर्माण में देरी का मुद्दा नहीं रह गई है। करोड़ों रुपए के उपकरणों की कथित बर्बादी और बढ़ती लागत ने जवाबदेही को लेकर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। रायपुर की जनता अब जानना चाहती है कि इस नुकसान का जिम्मेदार कौन है और आखिर शहर को उसका बहुप्रतीक्षित स्काईवॉक कब मिलेगा?












