Rabindranath Tagore:'तथ्य कई हैं, लेकिन सच एक ही है', रवीन्द्रनाथ टैगोर; कलम से दिलों तक का सफर...

रवीन्द्रनाथ टैगोर का मानना था कि शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इंसान को सोचने, समझने और बेहतर बनने की आजादी देनी चाहिए। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची महानता ज्ञान के साथ संवेदनशीलता और मानवता में बसती है।
8 साल की उम्र से लिखी कविता
रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 में हुआ था। उन्होंने महज 8 साल की उम्र में अपनी पहली कविता लिखी थी। उसके बाद 16 साल की उम्र में उनकी पहली लघुकथा प्रकाशित हुई। टैगोर संभवत: दुनिया के इकलौते ऐसे शख्स हैं, जिनकी रचनाएं 2 देशों का राष्ट्रगान बनीं। भारत का राष्ट्रगान 'जन गण मन' और बांग्लादेश का राष्ट्रगान 'आमार सोनार बांग्ला' टैगोर की ही रचना हैं। टैगोर ने अपने जीवनकाल में 2200 से भी ज्यादा गीतों की रचना की।
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आइए, जानते हैं उनके कुछ ऐसे विचार, जो आज भी लोगों के दिल और सोच को नई दिशा देते हैं।
- 'उपदेश देना सरल है, पर उपाय बताना कठिन'।
- 'खुश रहना बहुत सरल है…लेकिन सरल होना बहुत मुश्किल है'।
- 'यदि आप सभी त्रुटियों के लिए दरवाजा बंद कर दोगे तो सच अपने आप बाहर हो जाएगा'।
- 'दोस्ती की गहराई परिचित की लंबाई पर निर्भर नहीं करती'।
- 'संगीत दो आत्माओं के बीच अनंत भरता है'।
- 'तथ्य कई हैं, लेकिन सच एक ही है'।
- 'जो मन की पीड़ा को स्पष्ट रूप में कह नहीं सकता, उसी को क्रोध अधिक आता है'।
- 'जिस तरह घोंसला सोती हुई चिड़िया को आश्रय देता है उसी तरह मौन तुम्हारी वाणी को आश्रय देता है'।
- 'विश्वविद्यालय महापुरुषों के निर्माण के कारखाने हैं और अध्यापक उन्हें बनाने वाले कारीगर हैं'
कविता के लिए इंग्लैंड से लौट आए थे- टैगोर
रवीन्द्रनाथ टैगोर अपने भाई-बहनों में सबसे छोटे थे उनका जन्म कोलकाता में हुआ। बचपन से ही उन्हें परिवार में साहित्यिक माहौल मिला, इसी वजह से उनकी रुचि भी साहित्य में ही रही। परिवार ने उन्हें कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड भेजा, लेकिन वहां उनका मन नहीं लगा और वह पढ़ाई पूरी किए बिना ही वापस लौट आए।
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अपनी कलम को बनाई प्रथम पहचान
टैगोर को डर था कि उनका कविताएं लिखने का शौक घर वालों को पसंद नहीं आएगा। इसलिए उन्होंने अपनी कविता की पहली किताब मैथिली में लिखी। इस किताब को उन्होंने छद्म नाम 'भानु सिंह' के नाम से लिखा। भानु का मतलब भी रवि ही होता है। ये कविताएं उन्होंने अपने परिवार वालों को सुनाईं। परिवार वाले बड़े खुश हुए, तो रवीन्द्रनाथ की रचनात्मक सोच को जैसे पंख मिल गए, इसके बाद गुरुदेव ने बांग्ला में रचनाएं लिखनी शुरू कीं, और वे एक महान कवि बन गए।











