हरिवंश नारायण फिर बने राज्यसभा सांसद :राष्ट्रपति ने किया नॉमिनेट, 2032 तक निभाएंगे जिम्मेदारी; नीतीश कुमार के हैं करीबी

नई दिल्ली। देश की राजनीति में एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह को फिर से राज्यसभा के लिए मनोनीत कर दिया है। इस फैसले के साथ ही हरिवंश का तीसरा कार्यकाल तय हो गया है और अब वे साल 2032 तक उच्च सदन के सदस्य बने रहेंगे।
यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब उनका पिछला कार्यकाल समाप्त हो चुका था और उनकी पार्टी ने उन्हें दोबारा उम्मीदवार भी नहीं बनाया था। ऐसे में उनकी राजनीतिक पारी खत्म मानी जा रही थी, लेकिन राष्ट्रपति के इस कदम ने सियासी समीकरण बदल दिए।
कैसे हुआ नॉमिनेशन?
हरिवंश नारायण सिंह का राज्यसभा सदस्य के रूप में कार्यकाल 9 अप्रैल को खत्म हो गया था। आम तौर पर ऐसी स्थिति में पार्टी ही अपने उम्मीदवार को दोबारा भेजती है, लेकिन इस बार जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने उन्हें टिकट नहीं दिया। इसके बाद यह माना जा रहा था कि, हरिवंश अब राज्यसभा से बाहर हो जाएंगे, लेकिन राष्ट्रपति ने अपने विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुए उन्हें नामित सदस्य के रूप में नियुक्त कर दिया।
गृह मंत्रालय द्वारा जारी गजट नोटिफिकेशन में इस बात की पुष्टि की गई है कि, एक सीट खाली होने के बाद उसे भरने के लिए हरिवंश को मनोनीत किया गया है।

क्या होता है राष्ट्रपति का कोटा?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राष्ट्रपति राज्यसभा में 12 सदस्यों को नामित कर सकते हैं। ये सदस्य आमतौर पर उन क्षेत्रों से आते हैं, जहां उन्होंने विशेष योगदान दिया हो, जैसे-
- कला
- साहित्य
- विज्ञान
- समाज सेवा
इन नामित सदस्यों का कार्यकाल भी 6 साल का होता है, ठीक वैसे ही जैसे चुने गए सांसदों का होता है।
हरिवंश का तीसरा कार्यकाल
हरिवंश नारायण सिंह के लिए यह राज्यसभा में तीसरा कार्यकाल होगा। इससे पहले-
- 2014 में पहली बार राज्यसभा पहुंचे।
- JDU ने उन्हें लगातार दो बार सांसद बनाया।
- अब तीसरी बार राष्ट्रपति के कोटे से एंट्री मिली।
इस बार उनका कार्यकाल 2032 तक रहेगा, जिससे उनकी संसदीय भूमिका और मजबूत हो गई है।
उपसभापति के रूप में भूमिका
हरिवंश सिर्फ सांसद ही नहीं, बल्कि राज्यसभा के उपसभापति भी हैं। उन्हें-
- 9 अगस्त 2018 को पहली बार उपसभापति चुना गया।
- 14 सितंबर 2020 को दोबारा इस पद पर चुना गया।
उनकी कार्यशैली को शांत, संतुलित और निष्पक्ष माना जाता है। सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाने और सभी दलों को समान अवसर देने के लिए वे जाने जाते हैं। अब उनके दोबारा सांसद बनने के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या वे तीसरी बार भी उपसभापति बन सकते हैं।
पत्रकार से नेता तक का सफर
हरिवंश नारायण सिंह का सफर काफी दिलचस्प रहा है। राजनीति में आने से पहले वे एक जाने-माने पत्रकार थे।
- हिंदी अखबार प्रभात खबर के प्रधान संपादक रहे।
- उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से पढ़ाई की।
- छात्र जीवन से ही लेखन और सामाजिक मुद्दों में रुचि।
पत्रकारिता में उनकी पहचान निष्पक्ष और सशक्त लेखन के लिए रही है। यही गुण उन्हें राजनीति में भी अलग पहचान दिलाते हैं।
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राजनीतिक पहचान
हरिवंश को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी नेताओं में गिना जाता है। JDU के साथ उनका जुड़ाव लंबे समय से रहा है। हालांकि, इस बार पार्टी ने उन्हें राज्यसभा नहीं भेजा, लेकिन राष्ट्रपति के मनोनयन ने उन्हें एक नया राजनीतिक जीवन दे दिया है।
क्यों खास है यह फैसला?
यह फैसला कई मायनों में बेहद खास माना जा रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि हरिवंश नारायण सिंह को उनकी पार्टी से टिकट न मिलने के बावजूद राज्यसभा में वापसी का मौका मिला है। इसके साथ ही राष्ट्रपति के कोटे से उन्हें तीसरा कार्यकाल दिया जाना उनकी राजनीतिक अहमियत को दर्शाता है। एक अनुभवी और संतुलित नेता को संसद में बनाए रखने का यह कदम भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वहीं, इस फैसले ने उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चल रहे सभी कयासों पर अचानक विराम लगा दिया है।
क्या बदलेंगे राजनीतिक समीकरण?
हरिवंश के नॉमिनेशन से राजनीतिक गलियारों में कई चर्चाएं शुरू हो गई हैं-
- क्या उन्हें फिर उपसभापति बनाया जाएगा?
- क्या यह केंद्र सरकार का रणनीतिक फैसला है?
- क्या इससे JDU और केंद्र के रिश्तों पर असर पड़ेगा?
हालांकि, फिलहाल इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन सियासी हलकों में चर्चा तेज है।
राज्यसभा में नामित सदस्य
राज्यसभा में 12 ऐसे सदस्य होते हैं, जिन्हें राष्ट्रपति खुद चुनते हैं। इन लोगों को इसलिए चुना जाता है ताकि अलग-अलग क्षेत्रों के जानकार लोग संसद में अपनी राय दे सकें और फैसले बेहतर तरीके से लिए जा सकें। हरिवंश नारायण सिंह का इस लिस्ट में शामिल होना उनके अनुभव और योगदान को दिखाता है।











