Kerala Election:बदलेगी सत्ता या तीसरी बार लौटेगी एलडीएफ, क्या भाजपा के प्रदर्शन से बदलेंगे समीकरण ?

केरल विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है और सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राज्य अपनी परंपरागत सत्ता परिवर्तन की राह पर लौटेगा या मौजूदा सरकार लगातार तीसरी बार जीत दर्ज कर इतिहास रचेगी। राज्य की राजनीति लंबे समय से दो बड़े गठबंधनों के इर्द-गिर्द घूमती रही है।
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बदलेगी सत्ता या तीसरी बार लौटेगी एलडीएफ, क्या भाजपा के प्रदर्शन से बदलेंगे समीकरण ?

एलडीएफ और यूडीएफ के बीच मुकाबला एक बार फिर दिलचस्प मोड़ पर है। जहां एक ओर सत्ता विरोधी लहर की चर्चा है, वहीं पिछले चुनावी आंकड़े बताते हैं कि तस्वीर उतनी सीधी नहीं है।

2021 में एलडीएफ ने दूसरी बार चुनाव जीता 

केरल की राजनीति में लंबे समय से सत्ता हर पांच साल में बदलती रही है, जहां लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) बारी-बारी से सरकार बनाते रहे हैं। लेकिन 2021 में एलडीएफ की लगातार दूसरी जीत ने इस परंपरा को तोड़ दिया था और अब तीसरी बार जीत की संभावना पर चर्चा हो रही है। सीएम पिनाराई विजयन के नेतृत्व में सरकार ने स्थिरता दिखाई है, जो राज्य की राजनीति में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। इससे पहले कोई भी मुख्यमंत्री लगातार दस साल तक सत्ता में नहीं रह पाया था। यही वजह है कि इस बार का चुनाव केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि राजनीतिक इतिहास रचने का मौका भी बन गया है। मतदाताओं के सामने अब परंपरा और स्थिरता के बीच चुनाव का सवाल खड़ा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता किस दिशा में फैसला करती है।

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यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को बढ़त मिलने की संभावना 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार यूडीएफ को बढ़त मिल सकती है क्योंकि एलडीएफ को दस साल की सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है। 2024 के लोकसभा चुनावों में यूडीएफ ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 20 में से 18 सीटों पर जीत हासिल की थी, जिससे उसका मनोबल काफी बढ़ा है। इसके अलावा 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में भी उसके प्रदर्शन ने उसे मजबूती दी है। इन नतीजों के बाद यह धारणा बनी है कि राज्य में बदलाव की लहर बन सकती है। हालांकि यह भी सच है कि केरल की राजनीति में मतदाता अक्सर अलग-अलग चुनावों में अलग रुझान दिखाते हैं। ऐसे में केवल लोकसभा या स्थानीय चुनावों के आधार पर निष्कर्ष निकालना आसान नहीं है। फिर भी यूडीएफ इस बार पूरे दमखम के साथ मैदान में उतरने की तैयारी में है।

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लोकसभा, विस चुनावों के नतीजों में अंतर 

केरल में पिछले तीन दशकों के चुनावी आंकड़े यह दिखाते हैं कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों के नतीजों में बड़ा अंतर रहा है। लोकसभा चुनावों में यूडीएफ का प्रदर्शन अक्सर बेहतर रहा है, लेकिन इसका असर विधानसभा चुनावों में हमेशा नहीं दिखता। मतदाता राष्ट्रीय और राज्य स्तर के मुद्दों को अलग-अलग नजरिए से देखते हैं। यही वजह है कि कई बार संसदीय चुनावों में जीत के बावजूद विधानसभा में हार का सामना करना पड़ा है। अन्य राज्यों जैसे हरियाणा और महाराष्ट्र के उदाहरण भी यही संकेत देते हैं कि लोकसभा के नतीजों को सीधे विधानसभा से जोड़ना सही नहीं है। केरल में भी यही ट्रेंड देखने को मिलता है, जिससे चुनावी समीकरण और जटिल हो जाते हैं। इस बार भी यही असमंजस राजनीतिक दलों के सामने चुनौती बना हुआ है।

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आंकड़ों से जानिए चुनावी गणित 

अब कुछ आंकड़ों से समझते हैं कि किस पार्टी का पलड़ा भारी है। बता दें कि केरल में 140 विधानसभा सीटें है इनके आंकड़े बताते हैं कि मुकाबला हमेशा करीबी रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में अंतर थोड़ा बढ़ा है। 2021 में एलडीएफ ने 99 सीटें जीती थीं, जबकि 2016 में उसे 91 और 2006 में 98 सीटें मिली थीं। वहीं 2011 में उसे मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा था। दिलचस्प बात यह है कि 89 सीटें ऐसी हैं जहां पिछले तीन चुनावों से एक ही गठबंधन का कब्जा बना हुआ है, जिनमें एलडीएफ के पास 50 और यूडीएफ के पास 39 सीटें हैं। यह दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर वोटर बेस काफी स्थिर है और बदलाव आसान नहीं है। ऐसे में चुनावी मुकाबला बेहद कड़ा और पेचीदा बना हुआ है। 

Rohit Sharma
By Rohit Sharma

पीपुल्स इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया स्टडीज, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय...Read More

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