
मुंबई के लंबे समय से चल रहे केस पर आखिरकार विराम लगा दिया है। मालेगांव बम धमाके मामले में हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी चार आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि उनके खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं हैं, इसलिए उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के बाद आरोपी लोकेश शर्मा, धन सिंह, राजेंद्र चौधरी और मनोहर नरवरिया को निर्दोष करार दिया। कोर्ट ने माना कि जांच के दौरान ऐसे ठोस सबूत पेश नहीं किए गए, जिनके आधार पर इन आरोपियों को दोषी ठहराया जा सके।
इस फैसले के बाद साफ हो गया कि कानून के सामने केवल शक के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।
इस केस से पहले भी एक और अहम फैसला सामने आया था। विशेष राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की अदालत ने साल 2008 के मालेगांव धमाके से जुड़े सात आरोपियों को बरी कर दिया था। इनमें साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, मेजर (रिटायर्ड) रमेश उपाध्याय, सुधाकर चतुर्वेदी, अजय राहिरकर, सुधाकर धर द्विवेदी और समीर कुलकर्णी जैसे नाम शामिल थे।
अदालत ने कहा था कि इन आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं। इसी वजह से गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), शस्त्र अधिनियम और भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत लगाए गए सभी आरोप हटा दिए गए।
मालेगांव में यह धमाका 29 सितंबर 2008 को हुआ था। महाराष्ट्र के नासिक जिले के इस शहर में भिक्कू चौक मस्जिद के पास एक मोटरसाइकिल में बम लगाया गया था, जो अचानक फट गया।
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यह धमाका ऐसे समय हुआ था जब रमजान का पवित्र महीना चल रहा था और नवरात्रि भी आने वाली थी। धमाके में कई लोगों की जान चली गई और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए। इस घटना ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था और इसे एक बड़ी आतंकी घटना माना गया।
इस मामले की शुरुआत में जांच महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ता (ATS) ने की थी। ATS ने आरोपियों को गिरफ्तार किया और उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। लेकिन साल 2011 में यह केस राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंप दिया गया। NIA ने मामले की दोबारा जांच की और 2016 में एक पूरी चार्जशीट पेश की। जांच के दौरान करीब 323 गवाहों को कोर्ट में पेश किया। लेकिन इनमें से 34 गवाह अपने बयान से पलट गए।
पूरे मामले में सबसे बड़ी समस्या यही रही कि आरोपियों के खिलाफ मजबूत और साफ सबूत नहीं मिल पाए। कोर्ट ने साफ किया कि केवल शक या आरोप के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कानून के तहत हर आरोप को साबित करना जरूरी होता है।