भोपाल। मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने जल संसाधन विभाग की टेंडर प्रक्रिया, सिंचाई परियोजनाओं और फर्जी बैंक गारंटी के मुद्दे पर प्रदेश सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि सरकार लगातार कर्ज ले रही है और हाल ही में 5800 करोड़ रुपए का नया कर्ज लिया गया है, लेकिन इसका उपयोग कहां हो रहा है, यह स्पष्ट नहीं है। पटवारी ने कहा कि सरकार ने इस वर्ष को कृषि वर्ष घोषित किया है, जबकि जमीन पर सिंचाई परियोजनाएं ठप पड़ी हैं और किसान पानी के लिए परेशान हैं।
पटवारी ने कहा कि 2 मार्च को कांग्रेस ने दस्तावेजों के आधार पर खुलासा किया था कि जल संसाधन विभाग के बड़े टेंडरों में गिनी-चुनी कंपनियों का दबदबा है। कई टेंडरों में वही कंपनियां कभी एल-1, कभी एल-2 और कभी एल-3 बनती दिखाई देती हैं, जिससे टेंडर रोटेशन सिस्टम की आशंका पैदा होती है। उन्होंने कहा कि बड़े टेंडरों में बार-बार फलोदी कंस्ट्रक्शन और गुप्ता कंस्ट्रक्शन के नाम सामने आते हैं, जिसके मालिक जगदीश गुप्ता बताए जाते हैं। कांग्रेस ने सवाल उठाया कि आखिर सरकार इन कंपनियों पर इतनी मेहरबान क्यों है?
कांग्रेस अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि विभागीय गतिविधियों में नौशाद और अश्विन नाटू नाम के लोगों की भूमिका की चर्चा है, जबकि वे सरकारी अधिकारी नहीं हैं। जानकारी के अनुसार इन दोनों के ठेकेदार कंपनियों के साथ व्यावसायिक संबंध बताए जा रहे हैं और टेंडरों में हिस्सेदारी की बात भी सामने आई है। पटवारी ने दावा किया कि इन लोगों और कुछ ठेकेदारों के दुबई में भी व्यापारिक संबंध हैं, जिसमें नेताओं और मंत्रियों के रिश्तेदारों की साझेदारी होने की आशंका है।
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पटवारी ने आरोप लगाया कि कुछ सिंचाई परियोजनाओं में तकनीकी गड़बड़ियां भी सामने आई हैं, जहां जमीन पर सस्ती एचडीपीई पाइप लगाकर कागजों में महंगी डीआई पाइप का भुगतान दिखाया गया है। उन्होंने कहा कि फर्जी बैंक गारंटी के आधार पर कंपनियां टेंडर हासिल कर एडवांस भुगतान ले रही हैं और काम में देरी कर रही हैं। कांग्रेस ने मांग की है कि जल संसाधन और एनवीडीए विभाग में इलेक्ट्रॉनिक बैंक गारंटी प्रणाली लागू की जाए और सभी बैंक गारंटियों की जांच हो। साथ ही 2023-24 के टेंडरों की न्यायिक जांच और भुगतानों का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए।
पटवारी ने केन-बेतवा नदी लिंक परियोजना और पार्वती-सिंध परियोजना में देरी और पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि केन-बेतवा परियोजना में पन्ना टाइगर रिजर्व का बड़ा हिस्सा प्रभावित होगा, आदिवासियों की जमीन डूबेगी और मध्यप्रदेश को नुकसान होने की आशंका है, जबकि लाभ उत्तर प्रदेश को ज्यादा मिल सकता है।