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बंटवारे ने बदल दी कंपनी की किस्मत :‘महिंद्रा एंड मोहम्मद’ से ‘महिंद्रा एंड महिंद्रा’ बनने की दिलचस्प कहानी

भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दौर में एक कंपनी की पहचान भी बदल गई। ‘महिंद्रा एंड मोहम्मद’ से ‘महिंद्रा एंड महिंद्रा’ बनने की यह कहानी सिर्फ बिजनेस नहीं बल्कि दोस्ती, भरोसे और हालात की मिसाल है। जानिए कैसे एक छोटा स्टील कारोबार आज भारत के बड़े ऑटोमोबाइल समूह में बदल गया।
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‘महिंद्रा एंड मोहम्मद’ से ‘महिंद्रा एंड महिंद्रा’ बनने की दिलचस्प कहानी
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    साल 1947… देश बंट रहा था, लोग बिछड़ रहे थे और इतिहास का सबसे कठिन दौर चल रहा था। इसी समय एक छोटी सी कंपनी भी अपने भविष्य के सबसे बड़े मोड़ पर खड़ी थी। हालात ऐसे बने कि इस कंपनी का नाम, साझेदारी और दिशा-सब कुछ बदल गया। आज जिसे हम Mahindra & Mahindra के नाम से जानते हैं, उसकी शुरुआत एक अलग नाम और अलग सोच के साथ हुई थी। यह कहानी सिर्फ एक कंपनी की नहीं, बल्कि दोस्ती, भरोसे और बदलते वक्त की भी है।

    जब तीन दोस्तों ने मिलकर रखी नींव

    यह कहानी शुरू होती है साल 1945 से, जब पंजाब के लुधियाना में दो भाई-केसी महिंद्रा और जेसी महिंद्रा ने अपने दोस्त गुलाम मोहम्मद के साथ मिलकर एक स्टील ट्रेडिंग कंपनी शुरू की। तीनों के बीच बराबरी और भरोसे को दिखाने के लिए कंपनी का नाम रखा गया-Mahindra & Mohammed। उस समय यह सिर्फ एक छोटा कारोबार था लेकिन इसकी नींव मजबूत रिश्तों पर टिकी थी। किसी ने नहीं सोचा था कि यही छोटी शुरुआत आगे चलकर एक बड़े बिजनेस साम्राज्य में बदल जाएगी।

    1947: जब बंटवारे ने बदल दी दिशा

    फिर आया साल 1947 और देश का बंटवारा। इस घटना ने सिर्फ लोगों को ही नहीं, बल्कि इस कंपनी को भी प्रभावित किया। गुलाम मोहम्मद पाकिस्तान चले गए, जहां उन्होंने आगे चलकर अहम सरकारी पद संभाले। वहीं महिंद्रा भाई भारत में ही रहे और बिजनेस को आगे बढ़ाने का फैसला किया। अब सबसे बड़ा सवाल था-कंपनी का नाम क्या होगा?

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    नाम बदला, लेकिन पहचान वही रही

    कंपनी के दस्तावेजों, बिलों और लेटरहेड पर पहले से ‘M&M’ लिखा हुआ था। ऐसे में इसे पूरी तरह बदलना आसान नहीं था। महिंद्रा भाइयों ने एक दिलचस्प फैसला लिया-उन्होंने ‘M&M’ को बरकरार रखा, लेकिन इसका मतलब बदल दिया। इसी तरह ‘Mahindra & Mohammed’ से ‘Mahindra & Mahindra’ नाम सामने आया। यह बदलाव मजबूरी में हुआ लेकिन यही आगे चलकर ब्रांड की पहचान बन गया।

    दोस्ती खत्म नहीं हुई

    हालांकि साझेदारी खत्म हो गई थी, लेकिन रिश्ते नहीं टूटे। बताया जाता है कि बंटवारे के बाद भी गुलाम मोहम्मद और महिंद्रा परिवार के बीच संपर्क बना रहा। यह उस दौर की एक ऐसी मिसाल है, जो बताती है कि हालात चाहे जैसे हों, रिश्तों की अहमियत हमेशा रहती है।

    स्टील से शुरू होकर गाड़ियों तक पहुंचा सफर

    शुरुआत स्टील ट्रेडिंग से हुई थी, लेकिन कंपनी ने जल्द ही अपनी दिशा बदल दी। 1947 में ही कंपनी ने ऑटोमोबाइल सेक्टर में कदम रखा और Willys Jeep को असेंबल करना शुरू किया। 1949 में इस काम ने रफ्तार पकड़ी, जब जीप्स के पार्ट्स भारत लाकर यहां असेंबल किए जाने लगे। यही कदम आगे चलकर कंपनी के ऑटोमोबाइल बिजनेस की नींव बना।

    1950 का दशक: तेजी से बढ़ती कंपनी

    1950 के दशक में कंपनी ने तेजी से विस्तार किया। 1955 में यह पब्लिक कंपनी बनी और 1956 में शेयर बाजार में लिस्ट हुई। इससे कंपनी को फंड मिला और विस्तार का रास्ता खुल गया। यह वह दौर था, जब एक छोटी कंपनी बड़े ब्रांड में बदलने लगी थी।

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    खेती से जुड़कर और मजबूत हुआ बिजनेस

    1960 के दशक में कंपनी ने ट्रैक्टर सेगमेंट में एंट्री की। इस कदम ने उसे ग्रामीण भारत से जोड़ दिया और खेती से जुड़े कामों में उसकी पहचान मजबूत हुई। धीरे-धीरे कंपनी ने Mitsubishi और Peugeot जैसी विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी भी शुरू की, जिससे उसका दायरा और बढ़ गया।

    एक खास पल जिसने दिलाई पहचान

    1964 में कंपनी को एक खास मौका मिला, जब एक खास Mahindra Jeep का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम में किया गया। इससे कंपनी को नई पहचान मिली और यह सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया में भी जानी जाने लगी।

    आज की महिंद्रा, लेकिन जड़ें पुरानी

    आज Mahindra & Mahindra एक बड़ा नाम है, जो ऑटोमोबाइल से लेकर फार्मिंग और कई सेक्टर में काम कर रहा है। लेकिन इसकी असली कहानी उस दौर से जुड़ी है, जब देश खुद को नए रूप में ढाल रहा था और एक कंपनी भी अपने अस्तित्व को बचाते हुए आगे बढ़ रही थी।

    Sona Rajput
    By Sona Rajput

    माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन किया है। साल 2022 ...Read More

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