राजीव सोनी, भोपाल। प्रशासनिक कामकाज में प्रेशर को लेकर बहुत अतिशयोक्ति भी चलती है। यह इस सेवा में आने को इच्छुक युवाओं को हतोत्साहित करने वाली बात है। हम एक ऐसी व्यवस्था में काम करते हैं जिसमें निर्वाचितों के अधीनस्थ चयनितों को काम करना ही करना है और उनके इनपुट की अपनी उपयोगिता है क्योंकि वे जनता के सीधे संपर्क में रहते हैं। जहां तक प्रेशर की बात है, दबावों के चेहरे नहीं मुखौटे होते हैं। आप दबाव को नकारात्मक अर्थ में क्यों लेते हैं। मुझे लगता है 'नो प्रेशर नो डायमंड्स, मतलब हीरे की चमक तो प्रेशर से ही आती है। यह फलसफा मध्यप्रदेश के सेवानिवृत्त आईएएस और वर्तमान में राज्य निर्वाचन आयुक्त मनोज श्रीवास्तव का है। वह बताते हैं कि प्रशासनिक कार्य में प्रेशर तो रहा लेकिन सरकार का एप्रीसिएशन भी उतना ही मिला।

सागर, इंदौर और मंदसौर में सत्ताधारी दल के दिग्गज नेताओं से भी पंगा लेने में उन्हें हिचक नहीं हुई। इन जिलों में अतिक्रमण विरोधी उनकी मुहिम को देशव्यापी सुर्खियां मिलीं। उनके कुछ कथन खासे चर्चित रहे- हम भवन नहीं, भरम तोड़ते हैं। या आतंक के राज से राज का आतंक बेहतर है। खासतौर पर इंदौर में सत्ता पक्ष के नेता की बहुमंजिला बिल्डिंग को बम से उड़ाने, मंदसौर के ताकतवर ड्रग जार मो. शफी के ठिकानों पर छापामारी के बाद तो लोग उनके मुरीद हो गए थे। सेलिब्रिटी की तरह लोग उनके ऑटोग्राफ मांगने लगे थे। झाबुआ में उनके रचनात्मक कामों को देखने कैबिनेट सेक्रेटरी भी आये और तेरह देशों की टीमें भी।
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श्रीवास्तव बताते हैं कि 'लोकप्रियता परिणाम हो सकती है, कोशिश नहीं। वह आपके काम की परिणति होना चाहिए। चार दशक के कार्यकाल को पीछे मुड़कर देखने पर कोई ऐसा काम जिसे न कर पाने का मलाल हो? इस पर उनका कहना है कि कई हैं। मैं उज्जैन में कुंभ संग्रहालय बनाना चाहता था और चौंसठ कलाओं की अकादमी भी - कुछ नहीं हो पाया। राम वन गमनपथ की बात सबसे पहले 2007 में की गई थी, नहीं हुआ। तो अतृप्ति का भाव हमेशा रहा, रहना भी चाहिए। यही प्रशासनिक जीवन है। जितना कुछ कर गुजरने का संतोष होता है, उससे कहीं ज्यादा बड़ा बहुत कुछ न कर पाने का असंतोष होता है। वैसे हम लोग ढल जाते हैं। बदलाव-ट्रांसफर होते ही 'स्विच ऑफ' हो जाता है और नए काम की 'थॉट प्रोसेस' शुरू हो जाती है।
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