तीन दिवसीय विशेष सत्र के दौरान पेश किया गया 131वां संशोधन बिल वोटिंग में पास नहीं हो पाया। पक्ष में 298 और विपक्ष में 230 वोट पड़े, जबकि बिल को पारित करने के लिए 352 वोटों की आवश्यकता थी। सत्ता पक्ष ने इसे ऐतिहासिक बताया, वहीं विपक्ष ने इसे अधूरा और भ्रामक करार दिया।
लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा के दौरान माहौल काफी गर्म रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी दलों से अपील की कि वे राजनीति से ऊपर उठकर इस बिल का समर्थन करें और महिलाओं को उनका अधिकार दिलाएं। उन्होंने इसे देश के लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत करने वाला कदम बताया। वहीं विपक्ष ने इस अपील पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार की मंशा साफ नहीं है और बिल को सही तरीके से लागू करने की योजना स्पष्ट नहीं है। बहस के दौरान कई सांसदों ने अपने-अपने तर्क रखे और महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए।
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शुक्रवार शाम को हुई वोटिंग में यह विधेयक पास नहीं हो सका। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने बताया कि कुल 528 वोट पड़े, जिनमें 298 पक्ष में और 230 विरोध में रहे। पहले राउंड में भी आंकड़े उम्मीद से कम रहे। इस बिल को पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी 352 वोट चाहिए थे, लेकिन यह आंकड़ा हासिल नहीं हो पाया। आंकड़ों से साफ है कि समर्थन के बावजूद विपक्ष की मजबूती ने बिल की राह रोक दी और राजनीतिक सहमति की कमी सामने आई।
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केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बहस के दौरान परिसीमन का मुद्दा उठाया और कहा कि देश में संसदीय क्षेत्रों के आकार में भारी असमानता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि कहीं मतदाता संख्या 49 लाख तक है तो कहीं 60 हजार ही है, जिससे प्रतिनिधित्व में असंतुलन पैदा होता है। उन्होंने कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया समय-समय पर जरूरी है ताकि सांसद अपने क्षेत्र के लोगों से बेहतर जुड़ सकें। सरकार का मानना है कि इस प्रक्रिया के बिना महिला आरक्षण को पूरी तरह प्रभावी बनाना संभव नहीं होगा। इसी के साथ राहुल गांधी इसे छलावा करार देते हुए कहा कि यह महिलाओं के हित में नहीं बल्कि राजनीतिक लाभ के लिए लाया गया है। उन्होंने दावा किया कि सरकार जानबूझकर इसे ऐसे समय लाई है जब इसके पास पर्याप्त समर्थन नहीं है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के विधेयक पेश कर रही है। इस बयान ने सदन में बहस को और तेज कर दिया और राजनीतिक ध्रुवीकरण साफ नजर आया।