पल्लवी वाघेला, भोपाल। पिता के जेल और मां के घर छोड़कर जाने के बाद 16 साल की किशोरी और भाई-बहन की जिम्मेदारी 75 वर्षीय दादा निभा रहे थे। आर्थिक दबाव में दादा करीब दोगुनी उम्र के आदमी से किशोरी की शादी करने जा रहे थे। सूचना मिलने पर बाल विवाह रोका गया।
इसी तरह तीन साल पहले भोपाल के प्रतिष्ठित स्कूल में बच्ची से हुई छेड़छाड़ के मामले में आरोपी बनाई गई महिला को जेल भेज दिया गया। महिला का पति भी बच्चों को छोड़कर कहीं चला गया। ऐसे में टीनएजर बेटी नाना के पास रह गई। नतीजा, बच्ची अपने पड़ोसी किशोर के संपर्क में आई और गर्भवती हो गई। तीन माह पहले किशोरी ने मृत बच्चे को जन्म दिया। लेकिन इसके बाद भी बच्ची को दोबारा उसके नाना के पास रहने भेज दिया गया।
यह मामले सवाल खड़ा करते हैं कि बच्चों की सोशल सिक्योरिटी को लेकर जैसी व्यवस्थाएं और गंभीरता विदेशों में नजर आती हैं, वह सजगता देश और मप्र में क्यों नहीं है? हर साल ऐसे मामले सामने आते हैं, जिनमें माता-पिता खासकर मां के जेल चले जाने के बाद या अन्य कारणों से पीछे रह गए टीनएजर की पढ़ाई छूट जाती है। कई यौन अपराध के शिकार होते हैं तो कई नशे की जद में आ जाते हैं।
दरअसल, जिनके पास ये बच्चे रहते हैं या तो वह खुद लाचार होते हैं या उनके लिए यह बच्चे बोझ होते हैं। जिम्मेदारों का मत है कि बच्चे परिवार व्यवस्था में रहे यह ज्यादा बेहतर हैं। वहीं बच्चों के लिए काम करने वाली संस्थाओं का कहना है कि जिम्मेदार अधिकारियों को स्वत: संज्ञान लेकर निर्णय लेना चाहिए ताकि बच्चों के हित वास्तव में सुरक्षित हो सकें।
हमारे यहां परिवार के बेसिक राइट्स होते हैं, बच्चों को लेकर तो महिला एवं बाल विकास विभाग को यह सारी चीजें देखनी होती हैं। बच्चों की सोशल सिक्योरिटी के लिए बाल कल्याण समितियों के पास अधिकार हैं। बाल कल्याण समितियों को स्वत: संज्ञान लेना चाहिए। निर्णय लेने वाली समितियां स्थिति को देखें और निर्णय लें।
उपमा राय, पूर्व अध्यक्ष राज्य महिला आयोग
हमने जितना देखा है बाल कल्याण समितियां अच्छा काम कर रही हैं। जहां तक इस तरह के मामलों की बात है, यह सिस्टम से ज्यादा सामाजिक संवेदनशीलता का मामला है। यह स्वविवेक की बात है कि जिम्मेदार यह देखें कि क्या वास्तव में जहां बच्चा रह रहा है वहां वह सुरक्षित है और उसका संपूर्ण विकास संभव है।
कुमुदिनी पटेल, अतिरिक्त जिला न्यायाधीश