राजीव सोनी,भोपाल। प्रमुख ज्योतिर्लिंग के अलावा ओंकारेश्वर की नई प्रसिद्धि अंतर्राष्ट्रीय वेदांत संस्थान, अद्वैत लोक (एकात्म धाम ) और आदि शंकराचार्य की 108 फीट की भव्य विराट प्रतिमा के चलते देश-दुनिया में फैल चुकी है। कालिदास संस्कृत अकादमी, जिला प्रशासन खंडवा और ओंकारेश्वर नगर परिषद के संयुक्त तत्वावधान में यह आयोजन किया जा रहा है। 14-15 फरवरी को देश भर के विद्वान यहां एकत्र होंगे और 'शांकर समारोह' में अद्वैत वेदांत और शंकर वांग्मय केंद्रित विमर्श में चिंतन-मनन करेंगे। उनके द्वारा रचित संपूर्ण शास्त्र और साहित्य को एक स्थान पर सहेजने के प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया जाएगा।
आदि शंकराचार्य का मप्र कनेक्शन ओंकारेश्वर के अलावा अमरकंटक, उज्जैन और रीवा क्षेत्र के पचमठा से जोड़कर देखा जाता है। नर्मदा से उनका खास जुड़ाव देखा गया। ओंकारेश्वर में उनकी दीक्षा और तपोभूमि रही। करीब 1300 साल पहले यहीं उन्होंने 8 वर्ष की आयु में गुरु गोविंदपाद से दीक्षा ग्रहण की और अद्वैत ज्ञान प्राप्त किया। ओंकारेश्वर के नर्मदा तट पर वह 12 साल की उम्र तक साधनारत रहे। यहीं से उन्होंने सनातन धर्म के पुनरुत्थान के लिए भारत भ्रमण शुरू किया। चारों दिशाओं में 4 पीठों की स्थापना की।
प्रो. शिवशंकर मिश्र कुलगुरु महर्षि पाणिनी संस्कृत एवं वैदिक विवि, डॉ.रघुवीर प्रसाद गोस्वामी, डॉ. जेएन त्रिपाठी, डॉ. गोविंद पांडे, डॉ.संजय दुबे, प्रो.ओपी राजपाली, डॉ.नौनिहाल गौतम, डॉ. संतोष पंडया, डॉ. सदानंद त्रिपाठी और डॉ. रमेश शुक्ल सहित डॉ. सर्वेश्वर शर्मा आदि।
सवाल : आदि शंकराचार्य का संपूर्ण साहित्य सृजन अभी एक स्थान पर उपलब्ध है क्या?
जवाब : अभी उपलब्ध शास्त्र, भाष्य और साहित्य के अलावा भी अन्य उपनिषद भाष्य-ग्रंथ आदि के बारे में विद्वान विमर्श करेंगे।
सवाल : क्या शांकर समारोह में आदि शंकर द्वारा सृजित संपूर्ण साहित्य पर विमर्श होगा?
जवाब : हां, संपूर्ण समाज के हित को ध्यान में रखकर पहली बार ही विमर्श की थीम रखी गई है। अभी तक तक ही सीमित रहा।
सवाल : ओंकारेश्वर का ही चयन क्यों?
जवाब : आदि शंकराचार्य की दीक्षा भूमि के अलावा अद्वैत लोक भी एक कारण मान लें।
सवाल : आयोजन कितने दिन का रहेगा, क्या विमर्श के निष्कर्ष का दस्तावेजीकरण भी होगा?
जवाब : आयोजन के लिए महाशिवरात्रि पर दो दिन का समय रखा है। विमर्श को सभी माध्यम में संरक्षित रखेंगे।