रायपुर। प्रदेश के सभी जिलों में 10 फरवरी को एक साथ आयोजित सामूहिक विवाह समारोहों में कुल 6,412 जोड़े विधिवत परिणय सूत्र में बंधे।महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा समन्वित इस पूरे अभियान में सभी धर्मों और समुदायों के जोड़ों को शामिल किया गया तथा आत्मसमर्पित नक्सलियों सहित विशेष वर्ग के लोगों के पुनर्वास का संदेश भी दिया गया। राज्य के विभिन्न जिलों में यह आयोजन स्थानीय परंपराओं और भव्यता के साथ संपन्न हुआ।
बस्तर जिला मुख्यालय जगदलपुर के सिटी ग्राउंड में 280 जोड़ों का सामूहिक विवाह हुआ। पारंपरिक बस्तरिया 'मोहरी' बाजे के साथ निकली भव्य बारात ने पूरे शहर को उल्लास से भर दिया। विधि-विधान से पूरे समारोह की शोभा मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के वर्चुअल आशीर्वाद ने बढ़ाई।
सरगुजा जिले के अंबिकापुर स्थित पीजी कॉलेज हॉकी स्टेडियम में लगभग 260 जोड़ों ने साथ फेरे लिए। इस समारोह की विशेषता रही कि इसमें हिंदू और ईसाई समुदाय के जोड़ों को एक ही मंच पर समान सम्मान के साथ विवाह बंधन में बंधते देखा गया। हाउसिंग बोर्ड के अध्यक्ष अनुराग सिंह देव ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि यह योजना ग्रामीण क्षेत्र के आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए एक बड़ा सहारा है और सामाजिक स्तर पर अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य हो रहा है।
नारायणपुर जिले के इंडोर स्टेडियम, माहका में 166 जोड़ों का सामूहिक विवाह संपन्न हुआ, जिनमें 7 आत्मसमर्पित नक्सली जोड़े भी शामिल थे। जिला पंचायत अध्यक्ष नारायण मरकाम ने नवदंपतियों को आशीर्वाद देते हुए कहा कि यह योजना दहेज प्रथा पर प्रभावी अंकुश लगाने और सादगीपूर्ण विवाह को बढ़ावा देने का कार्य कर रही है। दंतेवाड़ा जिले में भी 191 जोड़ों के साथ-साथ एक आत्मसमर्पित नक्सली जोड़े का विवाह इसी योजना के तहत सम्मानजनक ढंग से संपन्न कराया गया। सभी जिलों के इन समारोहों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और समाज के गणमान्य लोगों ने नवविवाहित जोड़ों को आशीर्वाद प्रदान किया।
मुख्यमंत्री साय ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सभी जिलों में एक साथ जुड़कर जोड़ों को संबोधित किया। उन्होंने योजना के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्ष 2005 में पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के कार्यकाल में महज 5,000 रुपए की सहायता से शुरू हुई यह योजना आज 50,000 रुपए प्रति कन्या तक पहुंच चुकी है। इससे गरीब परिवारों को अपनी बेटियों का सम्मानजनक विवाह कराने में मदद मिल रही है और सामाजिक समरसता को बल मिल रहा है। इस ऐतिहासिक आयोजन का उद्देश्य न केवल गरीब परिवारों को आर्थिक सहायता प्रदान करना है, बल्कि सामाजिक कुरीतियों जैसे दहेज प्रथा पर अंकुश लगाना, सामूहिक विवाह को बढ़ावा देना और समाज के सभी वर्गों, जिसमें आत्मसमर्पित नक्सली भी शामिल हैं, को मुख्यधारा में लाना है।