PU Special :बलात्कार रोकने के लिए कानून की सख्ती काफी नहीं, 300 दोषसिद्ध कैदियों पर एनएलआईयू का शोध; बचपन से देनी होगी लैंगिक समानता की शिक्षा

रामचन्द्र पाण्डेय, भोपाल। शोध के मुताबिक, अपराधियों की सामाजिक पृष्ठभूमि, कानून की जानकारी, महिलाओं के प्रति सोच और न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता को समझना भी जरूरी है। अध्ययन में शामिल 300 दोषसिद्ध कैदियों में से 221 ने अपने अपराध पर पश्चाताप जताया। शोध में कहा गया है कि अपराध रोकने के लिए परिवार और स्कूल से ही लैंगिक समानता, सहमति और महिलाओं के प्रति सम्मान की समझ विकसित करनी होगी। इसके साथ प्रभावी जांच, वैज्ञानिक साक्ष्य, समयबद्ध न्याय और गवाहों की सुरक्षा पर भी ध्यान देना जरूरी है।
एनएलआईयू के शोध में सामने आई अहम बात
नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी के विधि शोधार्थी एवं अधिवक्ता डॉ. प्रखर बजाज ने भोपाल, ग्वालियर और इंदौर की जेलों में बंद बलात्कार के दोषसिद्ध कैदियों को शोध का केंद्र बनाया। इस समाज-विधिक अध्ययन में कुल 433 लोगों से जानकारी जुटाई गई, जिनमें 300 दोषसिद्ध कैदी, 60 पुलिस अधिकारी, 20 जेल अधिकारी और 53 विधिक पेशेवर शामिल थे। अध्ययन के मुताबिक, करीब 73 फीसदी कैदियों ने परिस्थिति या आवेश में अपराध करने और उसके बाद पश्चाताप होने की बात कही।
ये भी पढ़ें: भोपाल मास्टर प्लान-2047 के विरोध में प्रदर्शन, सड़कों पर उतरे किसान
बचपन की शिक्षा से बढ़ेगा महिलाओं के प्रति सम्मान
शोध के अनुसार, अपराध रोकने की शुरुआत केवल पुलिस, अदालत और जेल से नहीं, बल्कि परिवार और स्कूल से भी होनी चाहिए। पहली से आठवीं कक्षा तक बच्चों को उम्र के अनुरूप लैंगिक समानता, सहमति, महिलाओं की स्वतंत्रता और उनके प्रति सम्मान की शिक्षा दी जा सकती है। बचपन में विकसित होने वाली सोच आगे चलकर व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, केवल शिक्षा से अपराध पूरी तरह समाप्त होने की गारंटी नहीं है।
कठोर कानून के साथ प्रभावी कार्रवाई भी जरूरी
शोध में कहा गया है कि सजा की कठोरता के साथ अपराधियों के पकड़े जाने की संभावना, वैज्ञानिक जांच, साक्ष्यों की गुणवत्ता, समयबद्ध न्याय और गवाहों की सुरक्षा पर भी ध्यान देना होगा। अध्ययन में शामिल 60 पुलिस अधिकारियों में से 53 ने द्वितीयक मानसिक आघात से जुड़े अनुभव बताए। यह स्थिति पुलिसकर्मियों के बेहतर प्रशिक्षण और मनोवैज्ञानिक सहयोग की जरूरत को भी दर्शाती है। शोधार्थी डॉ. प्रखर बजाज के मुताबिक, बलात्कार रोकने के लिए कानून का निष्पक्ष क्रियान्वयन और अपराध की पुनरावृत्ति रोकने वाले साक्ष्य-आधारित उपाय जरूरी हैं।
आवेश में अपराध करने के बाद पश्चाताप की बात
भोपाल केंद्रीय जेल में बंद काल्पनिक नाम ‘अमित’ ने बताया कि उससे आवेश में आकर एक नाबालिग से बलात्कार जैसा अपराध हुआ। उसने घटना के बाद से अब तक पश्चाताप होने की बात कही। अमित के मुताबिक, वह परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य था और उसके माता-पिता उस पर निर्भर थे। जेल आने के बाद वह उनकी देखभाल नहीं कर पा रहा है और अपराध-बोध से घिरा रहता है।
अपराध का असर पूरे परिवार पर पड़ने की बात
इंदौर केंद्रीय जेल में बंद काल्पनिक नाम ‘लालू’ ने नाबालिग से बलात्कार के मामले में पछतावा होने की बात कही। उसने बताया कि कारावास के कारण उसका परिवार आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों से जूझ रहा है। वह अपनी जिम्मेदारियां नहीं निभा पा रहा है और अब अपने अपराध के दूरगामी परिणामों को महसूस कर रहा है। शोध की तथ्य फाइल के मुताबिक, 300 दोषसिद्ध कैदियों में 18 से 39 वर्ष की उम्र के 246 कैदी थे, जबकि 154 मामले नाबालिगों से बलात्कार से जुड़े थे।
मध्यप्रदेश में बलात्कार के आंकड़े बढ़ा रहे चिंता
मध्यप्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े आंकड़े चिंता बढ़ाते हैं। एनसीआरबी की वर्ष 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में बलात्कार के 2,979 मामले दर्ज हुए थे। इसी वर्ष बलात्कार या सामूहिक बलात्कार के साथ हत्या के 29 मामले भी दर्ज किए गए। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024 में बलात्कार के 3,061 मामले और हत्या के 55 मामले दर्ज हुए। अधिवक्ता एवं विशेषज्ञ महेन्द्र द्विवेदी के अनुसार, बच्चों को शुरुआती कक्षाओं से ही लैंगिक समानता, सहमति, महिलाओं की स्वतंत्रता और सम्मान का महत्व समझाना जरूरी है, जिसमें परिवार, सामाजिक वातावरण और मीडिया की भी अहम भूमिका है।
'केवल दंड की कठोरता पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं'
डॉ. प्रखर बजाज, शोधार्थी, एनएलआईयू ने बताया कि बलात्कार की रोकथाम के लिए केवल दंड की कठोरता पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। कानून के निष्पक्ष क्रियान्वयन, प्रभावी जांच, समयबद्ध न्याय और अपराध की पुनरावृत्ति रोकने वाले साक्ष्य-आधारित उपायों पर भी ध्यान देना होगा।




















