इंदौर में शिक्षा के नाम पर खुली लूट! 800 की NCERT किताबें बनीं 6500, पालकों पर डाला जा रहा जबरन बोझ

800 की NCERT किताबें बनीं 6500, पालकों पर डाला जा रहा जबरन बोझ
प्रतीकात्मक चित्र
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    इंदौर। इंदौर में शिक्षा व्यवस्था के नाम पर एक बार फिर बड़ा खेल सामने आया है। सरकार जहां एनसीईआरटी किताबों के जरिए पढ़ाई सस्ती करने की बात करती है, वहीं जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट नजर आ रही है। 800 रुपये की किताबें पालकों को 6500 रुपये तक में खरीदने पर मजबूर किया जा रहा है। निजी स्कूलों ने एनसीईआरटी लागू होने के बावजूद अपने स्तर पर “एडिशनल बुक सिस्टम” खड़ा कर लिया है। इन किताबों को अनिवार्य बताकर पालकों पर थोप दिया जाता है। नतीजा—हर साल नई किताबें, नया खर्च और बढ़ता आर्थिक बोझ।

    फरवरी से ही शुरू हो जाता है दबाव

    नए सत्र की शुरुआत से पहले ही स्कूल प्रबंधन फरवरी महीने से पालकों पर किताबें खरीदने का दबाव बनाना शुरू कर देते हैं। जबकि प्रशासन और शिक्षा विभाग अप्रैल में जागते हैं—वो भी सिर्फ हेल्पलाइन जारी करने और औपचारिक कार्रवाई तक सीमित रहते हैं। हकीकत यह है कि जब तक प्रशासन सक्रिय होता है, तब तक करीब 30% पालक पहले ही महंगी किताबें खरीद चुके होते हैं।

    एक ही दुकान से खरीदने की मजबूरी

    पालकों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि उन्हें “तय दुकानों” से ही किताबें खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। बाहर से खरीदने पर या तो किताबें मिलती नहीं या फिर स्कूल द्वारा अप्रत्यक्ष दबाव बनाया जाता है।हाल ही में इस तरह की मनमानी पर दो स्कूलों और दो दुकानों पर FIR भी दर्ज हो चुकी है, लेकिन इसके बावजूद हालात में कोई खास सुधार नजर नहीं आ रहा।

    30 से ज्यादा शिकायतें, फिर भी ढील

    जिला प्रशासन की हेल्पलाइन पर अब तक 30 से अधिक शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं। इनमें शामिल हैं—

    • तय दुकान से ही किताब खरीदने का दबाव
    • महंगे दामों पर बिक्री
    • यूनिफॉर्म भी एक ही दुकान से लेने की मजबूरी
    • किताबों के साथ पूरा स्टडी पैकेज थोपना

    लेकिन कार्रवाई अभी भी सीमित और चयनात्मक नजर आ रही है।

    दूसरी क्लास की किताबें 9000 रुपये!

    एक पालक ने बताया- “सरकार कहती है कि कहीं से भी किताब खरीद सकते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि स्कूल की किताबें सिर्फ उनके तय वेंडर के पास ही मिलती हैं। मेरे बच्चे की दूसरी क्लास की किताबों का बिल ही 9000 रुपये आ गया।”

    कंटेंट वही, कीमत नई

    पालकों का आरोप है कि किताबों का कंटेंट लगभग वही रहता है, बस कवर और प्रकाशक बदल दिए जाते हैं। कुछ अध्यायों में मामूली बदलाव कर दिए जाते हैं ताकि पुरानी किताबें उपयोग में न आ सकें।

    NCERT के नाम पर निजी किताबों का खेल

    एनसीईआरटी किताबों के साथ-साथ निजी प्रकाशकों की रेफरेंस बुक लेना लगभग अनिवार्य कर दिया गया है। ये किताबें एनसीईआरटी की तुलना में 5 से 6 गुना तक महंगी होती हैं। सूत्रों के अनुसार, इस पूरे खेल के पीछे कमीशन का बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है। प्रकाशक और बुक सेलर पहले से कमीशन तय कर लेते हैं और उसी आधार पर किताबें कोर्स में शामिल की जाती हैं।

    छोटी कक्षाओं में सबसे ज्यादा लूट

    कक्षा 1 से 8 तक के छात्रों के लिए हिंदी, गणित, विज्ञान के अलावा जीके, मोरल साइंस, कंप्यूटर जैसी कई अतिरिक्त किताबें जोड़ दी जाती हैं। इससे कुल खर्च कई गुना बढ़ जाता है।

    Hemant Nagle
    By Hemant Nagle

    हेमंत नागले | पिछले बीस वर्षों से अधिक समय से सक्रिय पत्रकारिता में हैं। वर्ष 2004 में मास्टर ऑफ जर्...

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