आउटसोर्स परवरिश का असर:छोटे बच्चे नैनी को ही मानने लगे मां, काउंसलिंग तक पहुंच रहे मामले

आउटसोर्स परवरिश के बढ़ते चलन के कारण छोटे बच्चे अपनी नैनी को ही मां मानने लगे हैं। यह गंभीर स्थिति अब काउंसलिंग तक पहुंच रही है जहां माता-पिता को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
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छोटे बच्चे नैनी को ही मानने लगे मां, काउंसलिंग तक पहुंच रहे मामले

पल्लवी वाघेला, भोपाल। देश के कई बड़े शहरों में छोटे बच्चों की परवरिश का एक नया और चिंताजनक ट्रेंड सामने आ रहा है। तेजी से बदलती लाइफस्टाइल, वर्किंग पेरेंट्स और एकल परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति के बीच 2 से 6 साल के बच्चे नैनी या डे-केयर पर अधिक निर्भर हो रहे हैं। कई मामलों में स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि बच्चे नैनी को ही अपनी मां मानने लगे हैं।

हर महीने सामने आ रहे 3 से 4 मामले

भोपाल में साइकोलॉजिस्ट और चाइल्ड काउंसलर के पास हर महीने ऐसे 3 से 4 केस पहुंच रहे हैं जिनमें बच्चे अपने माता-पिता से भावनात्मक दूरी महसूस कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह समस्या तेजी से बढ़ रही है और केवल भोपाल ही नहीं बल्कि प्रदेश के लगभग हर बड़े शहर में ऐसे मामले देखने को मिल रहे हैं।

नैनी या डे-केयर से बढ़ रहा लगाव

कई बच्चों का अधिकतर समय डे-केयर या नैनी के साथ बीतता है जिससे उनमें भावनात्मक जुड़ाव गहरा हो जाता है। स्थिति यहां तक पहुंच रही है कि

  • कुछ बच्चे नैनी के बिना खाना नहीं खाते
  • कुछ बच्चों को नैनी के बिना नींद नहीं आती
  • नैनी के जाने के बाद बच्चे मानसिक रूप से परेशान हो जाते हैं

कई मामलों में बच्चों को काउंसलिंग और थेरेपी तक की जरूरत पड़ रही है ताकि वे अपने माता-पिता से दोबारा भावनात्मक जुड़ाव बना सकें।

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अलग-अलग शहरों से सामने आए मामले

भोपाल का मामला

भोपाल में एक वर्किंग कपल ने बच्चे को कुछ समय के लिए डे-केयर में रखा था। बच्चा इतना जुड़ गया कि घर लौटने से मना करने लगा। बाद में नैनी रखी गई जो करीब ढाई साल तक बच्चे के साथ रही। नैनी के शादी के बाद नौकरी छोड़ने पर 5 साल के बच्चे ने खाना-पीना तक बंद कर दिया।

इंदौर का मामला

इंदौर में एक वर्किंग कपल के बच्चे को नैनी के साथ इतना लगाव हो गया कि वह उसके बिना सो नहीं पाता था। एक बार नैनी की छुट्टी पर बच्चे ने पूरी रात रोते हुए बिताई जिसके बाद मामला गंभीर हो गया और नैनी ने नौकरी छोड़ दी।

भोपाल का एक और केस

एक अन्य मामले में बच्चे की डिलीवरी के समय परिवार ने बुजुर्गों की जगह नैनी को प्राथमिकता दी। बच्चा इतना जुड़ गया कि वह अपने खास मौकों पर भी नैनी को ही प्राथमिकता देने लगा।

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भावनात्मक जुड़ाव बेहद जरूरी

साइकोलॉजिस्ट डॉ. दीप्ति सिंघल के अनुसार बच्चे के शुरुआती वर्षों में माता-पिता, खासकर मां के साथ भावनात्मक जुड़ाव बेहद जरूरी है। केवल नैनी पर निर्भरता कोई समस्या नहीं है लेकिन अगर माता-पिता का समय और जुड़ाव कम हो जाए तो बच्चों में असुरक्षा, व्यवहार संबंधी समस्याएं और भावनात्मक दूरी बढ़ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल नैनी या डे-केयर नहीं है बल्कि माता-पिता और बच्चों के बीच घटता क्वालिटी टाइम है। शुरुआती उम्र में मजबूत भावनात्मक जुड़ाव बच्चे के मानसिक विकास की नींव रखता है जिसकी कमी आगे चलकर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।

Sumit Shrivastava
By Sumit Shrivastava

सुमित श्रीवास्तव एक अनुभवी मीडिया प्रोफेशनल, बिजनेस पत्रकार और शोधकर्ता हैं। मास कम्युनिकेशन में M.P...Read More

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