पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण पर बड़ा बदलाव,66 वर्गों को मिलेगा 7% कोटा; विधानसभा से पास हुए दो नए कानून

पश्चिम बंगाल विधानसभा ने सोमवार को ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) आरक्षण से जुड़े दो महत्वपूर्ण संशोधन विधेयकों को पारित कर दिया। इन नए कानूनों के जरिए राज्य की आरक्षण व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया गया है। सरकार का कहना है कि यह फैसला कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश के अनुरूप लिया गया है और इसका मकसद आरक्षण प्रक्रिया को कानूनी रूप से मजबूत और पारदर्शी बनाना है। विधानसभा में विधेयक पेश होने के दौरान विपक्ष ने इसका विरोध किया। मतदान से पहले विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी समेत कुछ बागी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) विधायक सदन से वॉकआउट कर गए। हालांकि, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के समर्थक विधायकों ने सदन में रहकर विधेयकों के पक्ष में मतदान किया।
अब 66 वर्गों को मिलेगा 7 फीसदी आरक्षण
नए संशोधन के तहत ओबीसी श्रेणी में शामिल 66 वर्गों को अब 7 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा। इससे पहले यह कोटा 17 प्रतिशत था। सरकार ने हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार ओबीसी सूची का दोबारा परीक्षण किया और नई व्यवस्था लागू की। विधानसभा में इन विधेयकों के पक्ष में 186 विधायकों ने मतदान किया, जबकि 17 विधायकों ने विरोध में वोट डाला। छह विधायक मतदान के समय सदन में मौजूद नहीं थे।
113 वर्ग सूची से हटाए गए, मंत्री ने बताई वजह
राज्य के पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री गौरीशंकर घोष ने सदन में कहा कि सरकार ने हाईकोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह पालन किया है। उन्होंने कहा कि इन संशोधनों के पीछे कोई राजनीतिक मंशा नहीं है। हमने उन 113 वर्गों को सूची से हटा दिया है, जिन्हें बिना फील्ड सर्वे के शामिल किया गया था। अब केवल 66 ऐसे उप-वर्गों को रखा गया है, जिन्हें विस्तृत सर्वे के बाद सूची में शामिल किया गया था। उन्होंने यह भी बताया कि भविष्य में यदि कोई समुदाय ओबीसी सूची में शामिल होना चाहता है तो उसे पिछड़ा वर्ग आयोग के पास आवेदन करना होगा। आयोग जांच के बाद अपनी सिफारिश राज्य सरकार को भेजेगा।
विपक्ष ने किया विरोध, सेलेक्ट कमेटी को भेजने की मांग
विधेयकों पर चर्चा के दौरान आईएसएफ विधायक नौशाद सिद्दीकी और बागी टीएमसी विधायक बिश्वनाथ दास ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि इससे सामाजिक न्याय प्रभावित हो सकता है। दोनों नेताओं ने विधेयकों को पहले सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने की मांग भी की। उनके अनुरोध पर विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र बोस ने वोटों के विभाजन का आदेश दिया, जिसके बाद मतदान कराया गया।
क्या था कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला?
मई 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने 2010 से 2012 के बीच 77 अतिरिक्त समुदायों को दिए गए ओबीसी दर्जे को अवैध और असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था। अदालत ने कहा था कि इन समुदायों को तय प्रक्रिया और उचित सर्वे के बिना सूची में शामिल किया गया था। इस फैसले के बाद 2010 के बाद जारी करीब 12 लाख ओबीसी प्रमाणपत्र रद्द हो गए थे। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि जिन लोगों को पहले ही इस आरक्षण के आधार पर सरकारी नौकरी मिल चुकी है, उनकी सेवाएं प्रभावित नहीं होंगी। वहीं, 2010 से पहले जारी प्रमाणपत्रों को वैध माना गया था।
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नए कानून में क्या हैं प्रमुख प्रावधान?
नए संशोधन के अनुसार, राज्य सरकार जरूरत पड़ने पर पिछड़ा वर्ग आयोग की सलाह से आरक्षण प्रतिशत में बदलाव कर सकती है, लेकिन कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होगा। इसके अलावा किसी भी समुदाय को ओबीसी सूची में शामिल करने या हटाने का फैसला आयोग की जांच और सिफारिश के आधार पर ही होगा। आयोग के सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष तय किया गया है।












