मध्यप्रदेश की राजनीति में एक बार फिर से विधायकों की सदस्यता और सजा को लेकर बहस तेज हो गई है। दतिया से कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को कोर्ट द्वारा तीन साल की सजा सुनाए जाने के बाद उनकी विधायकी खत्म कर दी गई, जिससे यह मुद्दा फिर सुर्खियों में आ गया है कि आखिर किन परिस्थितियों में एक विधायक अपनी सीट गंवा देता है और कब उसे कोर्ट से राहत मिल जाती है।
प्रदेश में ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जहां विधायकों को सजा मिली। विधानसभा ने सीट रिक्त घोषित की लेकिन बाद में उच्च अदालतों से राहत मिलने पर सदस्यता बहाल हो गई। वहीं कुछ मामलों में विधायकी पूरी तरह खत्म हो गई।
ताजा मामला राजेंद्र भारती का है। जिन्हें दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने 1998 के बैंक धोखाधड़ी मामले में दोषी मानते हुए तीन साल की सजा सुनाई है। यह मामला उस समय का है जब वे दतिया सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के अध्यक्ष थे। उन पर पद का दुरुपयोग कर अवैध तरीके से ऋण बांटने का आरोप था। सुप्रीम कोर्ट के ‘लिली थॉमस’ फैसले के तहत दो साल या उससे अधिक की सजा मिलने पर विधायक की सदस्यता तुरंत समाप्त हो जाती है। इसी नियम के तहत विधानसभा सचिवालय ने उनकी सीट रिक्त घोषित कर दी। अब वे इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं।

बिजावर से भाजपा विधायक रहीं आशा रानी सिंह को घरेलू सहायिका को प्रताड़ित करने और आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में 10 साल की सजा सुनाई गई थी। सजा के बाद विधानसभा सचिवालय ने उनकी सदस्यता समाप्त कर दी और सीट रिक्त घोषित कर दी। उन्होंने हाई कोर्ट में अपील की लेकिन उन्हें राहत नहीं मिल सकी। यह प्रदेश का एक ऐसा मामला है, जहां सजा के बाद विधायक अपनी कुर्सी नहीं बचा सकीं।

पवई से भाजपा विधायक प्रहलाद लोधी को 2019 में एक मामले में दो साल की सजा सुनाई गई थी। उन पर तहसीलदार से मारपीट का आरोप था। सजा के बाद उनकी सदस्यता समाप्त कर दी गई थी, लेकिन उन्होंने हाई कोर्ट में अपील की। हाई कोर्ट ने उनकी सजा पर स्टे दे दिया, जिसके बाद उनकी सदस्यता बहाल हो गई। यह मामला बताता है कि समय पर कोर्ट से राहत मिलने पर विधायकी बच सकती है।

खरगापुर से विधायक रहे राहुल सिंह लोधी का मामला चुनाव याचिका से जुड़ा था। उन पर नामांकन पत्र में जानकारी छिपाने का आरोप लगा था। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने उनके चुनाव को शून्य घोषित कर दिया, जिसके बाद उनकी सदस्यता समाप्त कर दी गई। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने बाद में इस फैसले पर स्टे दे दिया, जिससे उनकी सदस्यता आंशिक रूप से बहाल हो गई। लेकिन उन्हें वोटिंग का अधिकार नहीं दिया गया।

विजयपुर से विधायक मुकेश मल्होत्रा को भी एक मामले में राहत मिली लेकिन पूरी तरह नहीं। हाई कोर्ट ने उनके चुनाव को रद्द कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें विधायक बने रहने की अनुमति दी। हालांकि उन्हें वेतन, सुविधाएं और वोट देने का अधिकार नहीं मिला।

विधायकों की सदस्यता खत्म होने के पीछे सुप्रीम कोर्ट का लिली थॉमस बनाम भारत सरकार फैसला अहम है। इस फैसले के अनुसार अगर किसी जनप्रतिनिधि को दो साल या उससे अधिक की सजा मिलती है तो उसकी सदस्यता तुरंत समाप्त हो जाती है।
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राजेंद्र भारती के मामले में जिस तेजी से कार्रवाई हुई, उसने राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है। विपक्ष का आरोप है कि विधानसभा ने रात में ही प्रक्रिया पूरी कर जल्दबाजी दिखाई। कुछ नेताओं का कहना है कि अपील के लिए समय दिया जाना चाहिए था, लेकिन बिना इंतजार किए कार्रवाई कर दी गई।