PU Special :जानिए मप्र की बिजली कंपनियों के ‘मिनिमम चार्ज’ का पूरा सच; MSME यूनिट संकट में, कारखाने बंद, फिर भी लाखों का बिल

संतोष चौधरी, भोपाल। बाजार में मंदी या ऑर्डर न मिलने के कारण उत्पादन ठप रहने पर भी प्रदेश के उद्योगपतियों को बिजली के भारी-भरकम बिलों से राहत नहीं मिल पा रही है। मप्र की बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) की फिक्स्ड चार्ज के साथ न्यूनतम शुल्क (मिनिमम चार्ज) की व्यवस्था ने राज्य के छोटे-बड़े उद्योगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
विभागीय और औद्योगिक संगठनों के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में बिजली की ऊंची दरों और मिनिमम चार्ज के कारण 3,000 से अधिक पंजीकृत एमएसएमई इकाइयां वित्तीय संकट में हैं। इंदौर-पीथमपुर, भोपाल-मंडीदीप और ग्वालियर-मालनपुर जैसे प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में ही 1,200 से अधिक छोटी-बड़ी इकाइयां ह्यसिकह्ण (बीमार) स्थिति में पहुंच चुकी हैं।
गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान में मिनिमम चार्ज नहीं
वहीं गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान ने मिनिमम चार्ज सालों पहले समाप्त कर दिया है। वहां केवल फिक्स्ड चार्ज और वास्तविक खपत के आधार पर भुगतान लिया जाता है। इसके विपरीत, मप्र में दोहरे शुल्क के कारण उत्पादन लागत बढ़ रही है और राज्य के उद्योग प्रतिस्पर्धी बाजार में पिछड़ रहे हैं।
मिनिमम चार्ज की दोहरी मार
छोटा कारखाना (100 केवीए कनेक्शन): फिक्स्ड चार्ज 39,900 रुपये बनता है। लेकिन 50 यूनिट प्रति केवीए की न्यूनतम खपत की बाध्यता के कारण 37,500 रुपये का मिनिमम चार्ज अलग से जुड़ जाता है। नतीजा-शून्य खपत पर भी 77,400 रुपये का बिल।
बड़ा कारखाना (500 केवीए कनेक्शन): बड़े उद्योगों का फिक्स्ड चार्ज 3,15,500 रुपये है, लेकिन मिनिमम चार्ज के नाम पर 3.73 लाख रुपये और जोड़ दिए जाते हैं। यानी बिना एक यूनिट बिजली जलाए भी 6,88,500 रुपये का बिल तय है।
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आयोग में दर्ज कराएंगे आपत्ति
मप्र पावर मैनेजमेंट कंपनी ने अगले पांच साल के टैरिफ निर्धारण के नियम एवं शर्तों के सिद्धांतों के लिए जारी प्रारूप विनियमन में मिनिमम चार्ज लागू रहने का प्रावधान प्रस्तावित किया है। विद्युत मामलों के जानकार राजेंद्र अग्रवाल और अन्य औद्योगिक संगठन इस प्रारूप का विरोध दर्ज कराने के लिए मप्र विद्युत नियामक आयोग में आपत्ति दर्ज कराने की तैयारी कर रहे हैं।
क्या कहते हैं इंडस्ट्रलिस्ट और अफसर
उद्योगों में पूरे साल एक जैसा उत्पादन नहीं होता। इसका असर बीमार और MSME इकाइयों पर पड़ रहा है। वे आयोग में आपत्ति दर्ज कराने जा रहे हैं।
-योगेश गोयल, डायरेक्टर, अल्को इलेक्ट्रोस्ट्रिप्स, गोविंदपुरा
-राजेंद्र अग्रवाल, विद्युत मामलों के जानकार
-राजीव अग्रवाल, चेयरमैन, एसोसिएशन ऑफ ऑल इंडस्ट्रीज, मंडीदीप
मल्टी-ईयर टैरिफ के प्रारूप में टैरिफ ऑर्डर के हिस्से के रूप में न्यूनतम टैरिफ बिल भेजने का प्रावधान है। न्यूनतम टैरिफ का यह मामला नियामक आयोग अपने टैरिफ आदेशों के माध्यम से तय करता है।
-विशेष गढ़पाले, एमडी, मप्र पावर मैनेजमेंट कंपनी
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