हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी:मूल्यांकन में टचस्क्रीन और डिजिटल पेन का हो इस्तेमाल, री-वैल्यूएशन की मांग खारिज

हाईकोर्ट ने मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता व सटीकता के लिए टचस्क्रीन और डिजिटल पेन के इस्तेमाल पर अहम टिप्पणी की है। इसी मामले में अदालत ने री-वैल्यूएशन की मांग को भी खारिज कर दिया जिससे भविष्य की मूल्यांकन पद्धतियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ने की उम्मीद है।
मूल्यांकन में टचस्क्रीन और डिजिटल पेन का हो इस्तेमाल, री-वैल्यूएशन की मांग खारिज

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी की डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली को पारदर्शी और विश्वसनीय मानते हुए री-वैल्यूएशन की मांग करने वाले दो छात्रों की याचिकाएं खारिज कर दी हैं। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने दोनों याचिकाकर्ताओं पर 5-5 हजार रुपए की लागत भी लगाई। हालांकि कोर्ट ने डिजिटल मूल्यांकन प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि मूल्यांकन के दौरान टचस्क्रीन डिवाइस और डिजिटल पेन का उपयोग किया जाना चाहिए ताकि परीक्षक स्पष्ट रूप से यह दर्शा सकें कि कौन-सा उत्तर सही है, कौन-सा गलत है और छात्र को कितने अंक प्रदान किए गए हैं।

दो छात्रों ने लगाई थी री-वैल्यूएशन की गुहार

यह मामला छिंदवाड़ा के बीएचएमएस छात्र अमरजीत भारद्वाज और जबलपुर की एमएससी नर्सिंग छात्रा प्रेमलता तिवारी द्वारा दायर याचिकाओं से जुड़ा था। दोनों छात्रों का आरोप था कि उनकी उत्तर पुस्तिकाओं में कुछ उत्तरों के सामने सही का चिन्ह लगाया गया था लेकिन उन्हें उसके अनुरूप अंक नहीं दिए गए। इसी आधार पर उन्होंने उत्तर पुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन और निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

स्वतंत्र विशेषज्ञों से कराई गई दोबारा जांच

मामले की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए हाईकोर्ट ने संबंधित उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन स्वतंत्र विशेषज्ञों से दोबारा कराया। जांच में सामने आया कि एमएससी नर्सिंग की छात्रा के अंकों में कोई बदलाव नहीं हुआ जबकि बीएचएमएस छात्र को पुनर्मूल्यांकन में पहले से भी कम अंक प्राप्त हुए। इस आधार पर कोर्ट ने माना कि मूल मूल्यांकन प्रक्रिया में किसी प्रकार की त्रुटि नहीं थी।

डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली को बताया पारदर्शी

अपने फैसले में डिवीजन बेंच ने कहा कि यूनिवर्सिटी की उत्तर पुस्तिकाओं की जांच डिजिटल फेयर इवैल्यूएशन सिस्टम के जरिए की जाती है। इस प्रक्रिया में उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन कर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मूल्यांकन किया जाता है, जिससे पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित होती है। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड और विशेषज्ञों की रिपोर्ट से मूल्यांकन प्रणाली में किसी प्रकार की खामी सामने नहीं आई है।

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मूल्यांकन प्रक्रिया और स्पष्ट करने की जरूरत

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि तकनीक आधारित मूल्यांकन प्रणाली को और बेहतर बनाया जा सकता है। इसके लिए परीक्षकों द्वारा उपयोग किए जाने वाले संकेतों, टिप्पणियों और अंक निर्धारण की प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट और समझने योग्य बनाया जाना चाहिए। कोर्ट का मानना है कि इससे छात्रों को अपने मूल्यांकन को समझने में आसानी होगी और अनावश्यक विवादों की संभावना भी कम होगी।

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मूल्यांकन कंपनी को भी दिए सुझाव

डिवीजन बेंच ने डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली संचालित करने वाली कंपनी माइंडलॉजिक्स इंफ्राटेक लिमिटेड को भी आवश्यक सुझाव दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि मूल्यांकन प्रक्रिया में उपयोग होने वाले चिन्हों, टिप्पणियों और अंक आवंटन की प्रणाली को अधिक पारदर्शी और स्पष्ट बनाया जाए ताकि छात्रों और संस्थानों के बीच विश्वास और बढ़ सके।

Sumit  Shrivastava
By Sumit Shrivastava

सुमित श्रीवास्तव एक अनुभवी मीडिया प्रोफेशनल, बिजनेस पत्रकार और शोधकर्ता हैं। मास कम्युनिकेशन में M.P...Read More

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