जबलपुर: फतवे के आधार पर तलाक नहीं ले सकता पति, MP हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट जाने को कहा

जबलपुर। भोपाल के एक व्यक्ति ने पत्नी से तलाक लेने के लिए दारुल इफ्ता मस्जिद कमेटी से फतवा जारी कराया था। इसी फतवे के आधार पर उसने फैमिली कोर्ट में तलाक की घोषणा को मान्यता देने की मांग की, लेकिन अदालत ने याचिका खारिज कर दी। इसके बाद मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पहुंचा, जहां जस्टिस विवेक जैन ने कहा कि किसी धार्मिक संस्था को तलाक घोषित करने का अधिकार नहीं है। अदालत के अनुसार तलाक के लिए फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 के तहत कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी।
'फतवे के जरिए तलाक नहीं लिया जा सकता'
भोपाल के रहने वाले दंपति के बीच आपसी विवाद के कारण दोनों पिछले दो वर्षों से अलग-अलग रह रहे हैं। पति अपनी पत्नी से अलग होना चाहता था, इसलिए उसने भोपाल की दारुल इफ्ता मस्जिद कमेटी को पत्र लिखकर तलाक के संबंध में राय मांगी। कमेटी ने जवाब दिया कि इस्लाम में पति-पत्नी के बीच संबंध नहीं बनने की स्थिति में अलग होने की व्यवस्था है, लेकिन यह केवल उनकी राय थी। पति पेशे से वकील हैं, जबकि पत्नी डॉक्टर हैं।
फैमिली कोर्ट ने खारिज कर दी याचिका
दारुल इफ्ता मस्जिद कमेटी ने इस संबंध में एक फतवा भी जारी किया। इसके बाद पति उसी फतवे के आधार पर भोपाल फैमिली कोर्ट पहुंचा और दावा किया कि वह पत्नी को तलाक दे चुका है और अदालत केवल इस तलाक को मान्यता दे। फैमिली कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि फतवे के आधार पर तलाक को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती। अदालत ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि अभी कानूनी रूप से तलाक हुआ ही नहीं है।
'कोई धार्मिक संस्था के पास तलाक का अधिकार नहीं'
फैमिली कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद पति ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में अपील दायर की। मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक जैन की अदालत में हुई। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कोई भी धार्मिक संस्था या दारुल इफ्ता पति-पत्नी के बीच तलाक कराने का अधिकार नहीं रखता। इसी के साथ अदालत ने कहा कि जारी किए गए फतवे में कहीं भी यह घोषणा नहीं की गई कि दोनों का तलाक हो चुका है। इसलिए इसे कानूनी तलाक नहीं माना जा सकता।
तलाक के लिए कानूनी प्रक्रिया का करना होगा पालन
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अगर पति अपनी पत्नी से तलाक चाहता है तो वह फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 7डी के तहत सीधे फैमिली कोर्ट में आवेदन कर सकता है। अदालत ने कहा कि शादी खत्म करने के लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। केवल धार्मिक राय या फतवे के आधार पर वैवाहिक संबंध समाप्त नहीं माने जा सकते।
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धार्मिक संस्थाओं को भी दिया स्पष्ट संदेश
जस्टिस विवेक जैन ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि सामाजिक और धार्मिक संस्थाएं इस प्रकार के फतवे जारी कर वैवाहिक संबंध समाप्त घोषित नहीं करें। अदालत ने कहा कि पति-पत्नी के विवाद और तलाक से जुड़े मामलों का अंतिम निर्णय केवल सक्षम कोर्ट ही कर सकता है।












