मप्र हाईकोर्ट ने मुकदमों में देरी पर गाइडलाइन की मांग ठुकराई, कहा- हर केस के लिए एक फॉर्मूला संभव नहीं

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अदालतों में मुकदमों के निपटारे में होने वाली देरी को लेकर दायर जनहित याचिका खारिज कर दी है। मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे और जस्टिस विवेक रूसिया की डिवीजन बेंच ने कहा कि सभी मुकदमों के लिए एक जैसी सख्त गाइडलाइन या तय समय सीमा लागू नहीं की जा सकती। हर मामले के तथ्य और परिस्थितियां अलग होती हैं, इसलिए न्यायिक प्रक्रिया के लिए एक समान फार्मूला तय करना उचित नहीं होगा। अदालत ने यह भी कहा कि मुकदमों में देरी के लिए केवल पेशी की तारीख या स्थगन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। न्यायाधीशों और लंबित मामलों के अनुपात में अंतर के अलावा कोर्टरूम, बुनियादी ढांचे, न्यायिक अधिकारियों और मंत्रालयिक कर्मचारियों की कमी जैसे कई प्रशासनिक कारण भी मामलों के निपटारे की गति को प्रभावित करते हैं। इन पहलुओं की समीक्षा राज्य सरकार को करनी चाहिए।
वकीलों ने मांगी थी सख्त गाइडलाइन
यह याचिका जबलपुर निवासी अधिवक्ता आनंद चावला और विद्या शंकर मिश्रा ने दायर की थी। याचिका में निचली अदालतों के साथ हाईकोर्ट में लंबित मामलों के जल्द निपटारे के लिए सख्त दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने बार-बार मिलने वाली तारीखों, स्थगन और अंतरिम आवेदनों की वजह से होने वाली देरी का मुद्दा उठाया था। उनका तर्क था कि इन कारणों से मामलों के अंतिम फैसले में अनावश्यक रूप से कई महीने लग जाते हैं। याचिका में झूठी याचिकाओं और गलत हलफनामों पर भारी जुर्माना लगाने की मांग भी की गई थी।
हर आवेदन पर दूसरे पक्ष को सुनना जरूरी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को महत्वपूर्ण बताया। बेंच ने कहा कि यदि किसी दीवानी मामले में कोई पक्ष अंतरिम आवेदन देता है तो न्यायाधीश के लिए जरूरी है कि दूसरे पक्ष को भी सुनवाई और जवाब देने का अवसर मिले। ऐसे आवेदन पर सुनवाई और आदेश पारित करने में लगने वाले समय को केवल मुकदमे में देरी के तौर पर नहीं देखा जा सकता। अदालत ने माना कि हर मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं और न्यायाधीश को उसी के अनुसार प्रक्रिया आगे बढ़ानी होती है।
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सिर्फ तारीखें ही देरी की वजह नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि मुकदमों के लंबित रहने की समस्या को केवल स्थगन या बार-बार तारीख मिलने तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। प्रदेश में न्यायाधीशों की उपलब्धता और लंबित मुकदमों की संख्या के बीच अंतर भी एक बड़ी चुनौती है। इसके अलावा कोर्टरूम की कमी, न्यायिक बुनियादी ढांचे की समस्याएं, न्यायाधीशों के रिक्त पद और मंत्रालयिक स्टाफ की कमी भी सुनवाई और फैसलों की गति को प्रभावित कर सकती है। अदालत ने इन व्यवस्थागत समस्याओं पर राज्य सरकार को ध्यान देने की जरूरत बताई।
एक जैसी समयसीमा तय करना आसान नहीं
डिवीजन बेंच ने माना कि सभी मुकदमों के लिए एक जैसी समयसीमा या कठोर प्रक्रिया तय करना व्यावहारिक नहीं है। किसी मामले में दस्तावेज और साक्ष्य अधिक हो सकते हैं, जबकि किसी अन्य मामले में प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल हो सकती है। इसी वजह से अदालत ने मुकदमों के जल्द निपटारे के लिए एक समान ‘रेडीमेड फॉर्मूला’ या सख्त एसओपी बनाने की मांग को स्वीकार नहीं किया।
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हाईकोर्ट और सरकार की ओर से अधिवक्ता मौजूद
सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ओर से अधिवक्ता संदीप कुमार शुक्ला और राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता राजवर्धन दत्त पड़रहा उपस्थित हुए। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक लालवानी और अधिवक्ता यश राज पटेल ने पक्ष रखा। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद मुकदमों के निपटारे में देरी की समस्या के समाधान को लेकर फोकस अब केवल सख्त न्यायिक गाइडलाइन तक सीमित नहीं रहेगा। अदालत की टिप्पणियों के अनुसार न्यायाधीशों की उपलब्धता, कोर्टरूम, बुनियादी सुविधाओं और जरूरी स्टाफ जैसे पहलुओं को भी सुधारना महत्वपूर्ण है।




















