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मप्र की हेरिटेज लिकर पॉलिसी लड़खड़ाई:भोपाल आउटलेट बंद, डिंडोरी डिस्टिलरी पर ताला; महुआ शराब को नहीं मिला बाजार

मध्य प्रदेश की हेरिटेज लिकर पॉलिसी बुरी तरह लड़खड़ा गई है। महुआ शराब को अपेक्षित बाजार न मिलने से भोपाल में आउटलेट बंद हो गए और डिंडोरी डिस्टिलरी पर ताला लटक गया है जिसने इस पहल के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
भोपाल आउटलेट बंद, डिंडोरी डिस्टिलरी पर ताला; महुआ शराब को नहीं मिला बाजार

संतोष चौधरी, भोपाल। आदिवासी संस्कृति को बढ़ावा देने और महुआ आधारित पारंपरिक पेयों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के उद्देश्य से शुरू की गई मध्यप्रदेश सरकार की हेरिटेज लिकर पॉलिसी अब मुश्किलों में घिरती नजर आ रही है। पॉलिसी लागू होने के दो साल के भीतर ही भोपाल का महुआ शराब आउटलेट बंद हो गया, डिंडोरी की डिस्टिलरी पर ताला लग गया जबकि आलीराजपुर की यूनिट भी संघर्ष कर रही है। फिलहाल महुआ से तैयार ‘मोंड’ ब्रांड की शराब की सप्लाई केवल एमपी टूरिज्म के होटलों, एयरपोर्ट और चुनिंदा एफएल-3 बार तक सीमित रह गई है। दूसरी ओर राजस्थान और गोवा जैसे राज्यों में हेरिटेज शराब उद्योग पर्यटन और निर्यात का बड़ा कारोबार बन चुका है।

पारंपरिक महुआ पेयों को संरक्षित करने के उद्देश्य से लागू हुई थी पॉलिसी

मध्यप्रदेश सरकार ने यह पॉलिसी आदिवासी संस्कृति और पारंपरिक महुआ पेयों को संरक्षित करने के उद्देश्य से लागू की थी। इसके जरिए ग्रामीण और आदिवासी महिलाओं को रोजगार और आर्थिक मजबूती देने का लक्ष्य रखा गया था। सरकार ने निवेश आकर्षित करने के लिए सात साल तक एक्साइज ड्यूटी और वैट में छूट जैसी सुविधाएं भी दी थीं।

घाटे में गया भोपाल का आउटलेट

भोपाल के कोलार रोड स्थित गेहूंखेड़ा में अगस्त 2025 में महुआ शराब का आउटलेट शुरू किया गया था। लेकिन लगातार घाटे के चलते इसे 31 मार्च 2026 से बंद करना पड़ा। आउटलेट संचालक रोहित चौधरी के मुताबिक महुआ शराब की कीमत ज्यादा होने की वजह से ग्राहक इसे नियमित रूप से स्वीकार नहीं कर पाए। अधिकतर लोग केवल स्वाद बदलने के लिए इसे खरीदते थे। एक बोतल की कीमत करीब 800 रुपए होने से बाजार सीमित रह गया।

आलीराजपुर में सीमित उत्पादन

आलीराजपुर जिले के कठियावाड़ा में हनुमान स्वयं सहायता समूह द्वारा संचालित डिस्टिलरी में फिलहाल हर महीने करीब 1200 लीटर शराब का उत्पादन हो रहा है। तकनीकी प्रभारी आकांक्षा बाबर के अनुसार यूनिट में अधिकांश काम मैन्युअल तरीके से होता है और हर चार दिन में एक बैच तैयार हो पाता है। समूह का कहना है कि यदि आधुनिक और स्वचालित मशीनें उपलब्ध हों तो उत्पादन कई गुना बढ़ाया जा सकता है। हालांकि यहां बिक्री की स्थिति भी कमजोर बनी हुई है। यूनिट के बाहर बने आउटलेट पर कभी-कभार ही कोई पर्यटक शराब खरीदने पहुंचता है। स्थानीय स्तर पर लोग पारंपरिक तरीके से घरों में ही महुआ शराब तैयार कर लेते हैं।

डिंडोरी डिस्टिलरी पर लगा ताला

आदिवासी बहुल डिंडोरी जिले में नर्मदा स्वयं सहायता समूह द्वारा करीब तीन करोड़ रुपए की लागत से डिस्टिलरी स्थापित की गई थी। उत्पादन शुरू होने के बावजूद तैयार माल की पर्याप्त बिक्री नहीं हो सकी। लगातार आर्थिक नुकसान के चलते श्रमिकों के भुगतान तक प्रभावित होने लगे और अंततः यूनिट बंद करनी पड़ी।

राजस्थान और गोवा में सफल हुआ मॉडल

राजस्थान और गोवा में हेरिटेज शराब उद्योग लंबे समय से मजबूत नेटवर्क और निजी निवेश के सहारे तेजी से विकसित हुआ है। राजस्थान में केसर कस्तूरी, महारानी महांसार, चंद्र हास, सोमरस और जगमोहन जैसे पारंपरिक ब्रांड राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच चुके हैं। वहीं गोवा की काजू और नारियल आधारित फेणी दशकों से पर्यटकों के बीच लोकप्रिय है। इन राज्यों में हेरिटेज शराब केवल सांस्कृतिक पहचान नहीं बल्कि पर्यटन और निर्यात आधारित उद्योग बन चुकी है।

मप्र में असफलता के बड़े कारण

विशेषज्ञों के अनुसार मध्यप्रदेश में हेरिटेज लिकर पॉलिसी कई वजहों से उम्मीद के मुताबिक सफलता हासिल नहीं कर सकी

  • डिस्टिलरी लगाने की अनुमति केवल 84 आदिवासी विकासखंडों तक सीमित
  • संचालन केवल महिला स्वयं सहायता समूहों तक सीमित
  • निजी निवेश और बड़े उद्योगों की भागीदारी का अभाव
  • महुआ शराब की ऊंची कीमत
  • ब्रांडिंग और मार्केटिंग बेहद कमजोर
  • आउटलेट और बिक्री केंद्रों की कमी
  • आधुनिक मशीनों के अभाव में कम उत्पादन
  • गांवों में पारंपरिक तरीके से पहले से महुआ शराब बनने के कारण सीमित बाजार
  • मजबूत वितरण नेटवर्क विकसित नहीं हो सका

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विशेषज्ञ बोले- मार्केटिंग और ब्रांडिंग सबसे बड़ी चुनौती

भोपाल के शराब कारोबारी सीपी तिवारी का कहना है कि मध्यप्रदेश सरकार ने हेरिटेज लिकर पॉलिसी बड़े उत्साह के साथ शुरू की थी लेकिन इसकी पर्याप्त मार्केटिंग और ब्रांडिंग नहीं हो सकी। उनके मुताबिक राजस्थान और गोवा में निजी डिस्टिलरीज के कारण प्रचार और बाजार मजबूत बना, जबकि मप्र इस मामले में पीछे रह गया।

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आबकारी आयुक्त बोले- समय देना होगा

मध्यप्रदेश के आबकारी आयुक्त दीपक सक्सेना का कहना है कि किसी भी नए कारोबार को स्थापित होने में समय लगता है। सरकार ने डिस्टिलरी संचालन के लिए कई तरह की सुविधाएं और छूट दी हैं। एफएल-3 बार में दो पेटी हेरिटेज शराब रखना अनिवार्य भी किया गया है। उनके मुताबिक लाइसेंस प्रक्रिया भी आसान बनाई गई है और इस उद्योग को बाजार में अपनी जगह बनाने के लिए थोड़ा समय देना होगा।

Sumit  Shrivastava
By Sumit Shrivastava

सुमित श्रीवास्तव एक अनुभवी मीडिया प्रोफेशनल, बिजनेस पत्रकार और शोधकर्ता हैं। मास कम्युनिकेशन में M.P...Read More

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