दवाओं के नाम पर मरीजों से ज्यादा वसूली अब नहीं! सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने दिया भरोसा

नई दिल्ली। अस्पताल में भर्ती होने के बाद मरीज और उसके परिवार की सबसे बड़ी चिंता इलाज के खर्च को लेकर होती है। दवाओं, इंजेक्शन और दूसरी मेडिकल सामग्री के बिल कई बार बजट से बाहर हो जाते हैं। अब इस मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में माना है कि अस्पतालों में दवाओं और मेडिकल सामान की कीमतों को लेकर मरीजों की स्थिति कमजोर रहती है। सरकार के अनुसार, कई मामलों में मरीजों को अपनी जरूरत की चीजों के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार उचित कदम उठाने पर विचार कर रही है।
अस्पतालों में दवाओं के ज्यादा दाम पर सरकार की नजर
अस्पतालों में इलाज के दौरान दवाओं और मेडिकल सामान के नाम पर अधिक पैसे वसूलने का मामला लंबे समय से चर्चा में है। रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में दिए अपने हलफनामे में इस समस्या को स्वीकार किया है। मंत्रालय का कहना है कि मरीजों के पास अस्पतालों से कीमतों को लेकर बातचीत करने के सीमित विकल्प होते हैं। ऐसे में उन्हें कई बार मजबूरी में अधिक खर्च उठाना पड़ता है। सरकार ने भरोसा दिया है कि इस मामले पर संबंधित पक्षों से बातचीत करके उचित कदम उठाने पर विचार किया जाएगा।
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कैंसर की दवाओं पर 700 प्रतिशत तक मार्जिन का दावा
सरकार के हलफनामे में कैंसर की दवाओं और मेडिकल उपभोग की वस्तुओं पर मिलने वाले ऊंचे मार्जिन का भी जिक्र किया गया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, कुछ एंटी-कैंसर दवाओं पर 170 से 700 प्रतिशत या उससे अधिक तक ट्रेड मार्जिन बताया गया है। वहीं, कुछ मेडिकल उपभोग की वस्तुओं पर यह मार्जिन 100 से 1,000 प्रतिशत या उससे ज्यादा होने की बात कही गई है। हलफनामे के अनुसार, अधिक मार्जिन मिलने के कारण अस्पताल ऐसी वस्तुओं को खरीदने में रुचि दिखा सकते हैं। इससे मरीजों के इलाज का कुल खर्च बढ़ने की आशंका रहती है।
मरीजों के पास कीमतों की जानकारी कम होने से बढ़ती है परेशानी
सरकार ने माना है कि दवा बाजार में कई कंपनियों के होने से प्रतिस्पर्धा बनी रहती है और भारत में अनेक दवाएं अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध हैं। लेकिन अस्पताल में इलाज की स्थिति सामान्य बाजार से अलग होती है। मरीज को अक्सर यह पता नहीं होता कि उसे दी जा रही दवा का दूसरा विकल्प क्या है और उसकी सही कीमत कितनी होनी चाहिए। डॉक्टरों, अस्पतालों और दवा विक्रेताओं के मुकाबले मरीज के पास जानकारी भी कम होती है। इसी वजह से केवल बाजार में प्रतिस्पर्धा होना मरीजों को अधिक खर्च से बचाने के लिए हमेशा पर्याप्त नहीं होता।
935 दवाओं की कीमत तय, हजारों अन्य पर भी नियंत्रण
मंत्रालय ने हलफनामे में बताया कि सरकार अब तक 935 निर्धारित दवा फॉर्मूलेशन की अधिकतम कीमत तय कर चुकी है। इसके अलावा, 3,881 नई दवाओं की खुदरा कीमतें भी निर्धारित की गई हैं। इन कदमों का उद्देश्य जरूरी दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण रखना और मरीजों को राहत देना है। हालांकि, अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली सभी दवाओं और मेडिकल उपभोग की वस्तुओं पर एक समान कीमत सीमा लागू करने का सवाल अभी भी महत्वपूर्ण है। इस पर आगे क्या फैसला होगा, यह सरकार की समीक्षा और संबंधित पक्षों के साथ होने वाली चर्चा पर निर्भर करेगा।




















