वन विभाग का दावा है कि हर गांव में फायर वाचर और चौकीदार तैनात हैं, लेकिन मौके पर कोई भी कर्मचारी नजर नहीं आया। आग लगने के दौरान विभागीय टीम की गैर मौजूदगी ने सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर समय रहते कार्रवाई होती, तो आग को फैलने से रोका जा सकता था।
गौरेला रेंज के छिंदपानी, बेंद्रापानी, पंडरीपानी, साल्हेघोरी और डाहीबहरा के पहाड़ी इलाकों में दर्जनों जगह आग देखी गई। छिंदपानी पहाड़ के ऊपर से पूरे जंगल में फैली आग का भयावह मंजर दिखाई दिया। इसके साथ ही आग की लपटें तेजी से फैलती नजर आईं, जिससे आसपास के वन क्षेत्र खतरे में आ गए। स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह आग कई घंटों तक जलती रही लेकिन समय पर नियंत्रण के प्रयास नजर नहीं आए।
इस भीषण आग से छोटे पौधों, झाड़ियों और वन्य जीवों को भारी नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है। जंगलों में रहने वाले जीव-जंतु इस आग की चपेट में आ सकते हैं, जिससे जैव विविधता पर असर पड़ेगा। हर साल गर्मी में ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, लेकिन इसके बावजूद ठोस रोकथाम के इंतजाम नहीं दिखते। इससे पर्यावरण संतुलन पर भी गंभीर असर पड़ने की चिंता बढ़ गई है।
आग बुझाने के लिए ब्लोअर जैसे संसाधनों की बात तो होती है, लेकिन पूरे रेंज में कई बीटों के बीच सिर्फ एक ब्लोअर होना व्यवस्था की पोल खोलता है। फायर वाचर भी प्रभावित क्षेत्रों तक नहीं पहुंचे, जिससे आग पर काबू पाने में देरी हुई। यह हालात वनाग्नि प्रबंधन के लिए जारी फंड के सही उपयोग पर सवाल खड़े करते हैं।
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मरवाही वनमंडल की डीएफओ ग्रीसमीं चांद का कहना है कि आग की घटनाएं सामने आई हैं, लेकिन स्थिति काबू में है और लगातार निगरानी की जा रही है। हालांकि, जमीनी तस्वीर विभागीय दावों से अलग नजर आ रही है, जिससे सवाल उठ रहे हैं कि आखिर कब तक हर साल जंगल यूं ही जलते रहेंगे।