देहरादून। हिमालय की गोद में बसे पवित्र धामों में एक बार फिर आस्था की रौनक लौटने वाली है। बर्फ की चादर ओढ़े महीनों से मौन साधे बैठे बाबा केदार अब अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए तैयार हैं। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर जैसे ही केदारनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि घोषित हुई, देश-विदेश में मौजूद शिव भक्तों के दिलों में उत्साह की लहर दौड़ गई। यह सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि विश्वास, तपस्या और आत्मिक शांति का मार्ग है, जो हर साल लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींच लाता है।
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ धाम के कपाट इस साल 22 अप्रैल को सुबह 8 बजे श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे। कपाट वृष लग्न में खुलेंगे, जिसे शास्त्रों में अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।
इसकी औपचारिक घोषणा महाशिवरात्रि के दिन पंचकेदार शीतकालीन गद्दी स्थल ओंकारेश्वर मंदिर, ऊखीमठ में वैदिक मंत्रोच्चार, विधि-विधान और पंचांग गणना के बाद की गई। घोषणा के साथ ही मंदिर परिसर “हर-हर महादेव” और “बोल-बम” के जयकारों से गूंज उठा।
इस साल केदारनाथ यात्रा पिछले वर्ष की तुलना में पहले शुरू हो रही है। पिछले साल बाबा केदारनाथ धाम के कपाट 10 मई को खुले थे, जबकि इस बार 22 अप्रैल को ही श्रद्धालुओं को दर्शन का सौभाग्य मिलेगा। यानी शिव भक्त इस बार करीब 10 दिन पहले बाबा केदार के चरणों में हाजिरी लगा सकेंगे।
यात्रा के जल्दी शुरू होने से न केवल श्रद्धालुओं को अधिक समय मिलेगा, बल्कि स्थानीय व्यापार, होटल व्यवसाय और रोजगार से जुड़े लोगों को भी बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है।
कपाट खुलने से पहले कई पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान पूरे किए जाएंगे, जो सदियों से चली आ रही परंपराओं का हिस्सा हैं-
18 अप्रैल: भगवान भैरवनाथ की विशेष पूजा
19 अप्रैल: ऊखीमठ से पंचमुखी डोली का प्रस्थान
20 अप्रैल: गौरीकुंड में रात्रि विश्राम
21 अप्रैल: केदारनाथ धाम पहुंचेंगी बाबा की डोली
22 अप्रैल सुबह 8 बजे: विधि-विधान के साथ कपाट खुलेंगे
मान्यता है कि, भैरवनाथ बाबा को केदारनाथ धाम का क्षेत्रपाल माना जाता है और उनकी पूजा के बिना कपाट नहीं खोले जाते।
कपाट खुलने की तिथि के साथ इस वर्ष केदारनाथ धाम के मुख्य पुजारी (रावल) की भी घोषणा कर दी गई है। इस बार टी. गंगाधर लिंग को बाबा केदारनाथ धाम में मुख्य पुजारी का दायित्व सौंपा गया है।
परंपरा के अनुसार केदारनाथ धाम के रावल दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य के वीरशैव (लिंगायत) संप्रदाय से होते हैं। यह परंपरा आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित मानी जाती है, जो आज भी पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ निभाई जा रही है।
कपाट खुलने की घोषणा के साथ ही राज्य सरकार, जिला प्रशासन और बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति ने तैयारियां तेज कर दी हैं। युद्धस्तर पर चल रहे कार्यों में शामिल हैं-
प्रशासन का लक्ष्य है कि, श्रद्धालुओं को इस बार और अधिक सुरक्षित, सुव्यवस्थित और सुविधाजनक यात्रा अनुभव मिल सके।
केदारनाथ यात्रा सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़ी मानी जाती है। 14 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई, शुद्ध हिमालयी हवा और अनुशासित दिनचर्या व्यक्ति को आत्मिक शांति और मानसिक मजबूती प्रदान करती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि, ऐसी आध्यात्मिक यात्राएं तनाव कम करने, आत्मविश्वास बढ़ाने और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने में मदद करती हैं।
मंदिर समिति के आंकड़ों के अनुसार, पिछले यात्रा सीजन में 17 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने बाबा केदारनाथ के दर्शन किए। 2013 की आपदा के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा माना गया था। इस बार यात्रा पहले शुरू होने के कारण रिकॉर्ड टूटने की संभावना जताई जा रही है।
सड़क मार्ग: ऋषिकेश - रुद्रप्रयाग - गौरीकुंड
पैदल यात्रा: गौरीकुंड से 14 किमी
हेलीकॉप्टर सेवा: फाटा, सिरसी और गुप्तकाशी से
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