भोपाल। राजधानी में महाशिवरात्रि के अवसर पर एक अनोखा धार्मिक आयोजन चर्चा का केंद्र बना। इस कार्यक्रम में हिमांगी सखी का पट्टाभिषेक कर उन्हें देश की पहली किन्नर शंकराचार्य घोषित किया गया। यह आयोजन किन्नर समुदाय की धार्मिक पहचान और भागीदारी को मुख्यधारा में स्थापित करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। कार्यक्रम के दौरान धर्मांतरित किन्नरों की घर वापसी भी कराई गई, जिसमें मुस्लिम पृष्ठभूमि से जुड़े किन्नरों ने शुद्धिकरण प्रक्रिया के बाद पुनः सनातन धर्म को अपनाया।
हिमांगी सखी मां वैष्णो किन्नर अखाड़ा की प्रमुख हैं और किन्नर समाज में लंबे समय से धार्मिक नेतृत्व की भूमिका निभा रही हैं। वे देश की पहली किन्नर भागवत कथा वाचक के रूप में भी जानी जाती हैं। मूल रूप से मुंबई से संबंध रखने वाली हिमांगी सखी अब पुष्कर पीठ से जुड़ी रहेंगी, जिसे उनके आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा।
सम्मेलन के दौरान किन्नर संत परंपरा को औपचारिक स्वरूप देने की दिशा में कुछ अन्य धार्मिक पदों की भी घोषणा की गई। इस अवसर पर काजल, तनीषा, संजना, संचिता को जगद्गुरु घोषित किया गया। इसके साथ ही सरिता, मंजू, पलपल, रानी और सागर को महामंडलेश्वर घोषित किया गया।
इस नियुक्ति को लेकर संत समाज के एक वर्ग ने आपत्ति भी जताई है। साधु-संत सन्यासी समिति के कार्यकारी अध्यक्ष स्वामी अनिलानंद ने कहा कि किन्नरों की सनातन धर्म में वापसी स्वागतयोग्य है, लेकिन अलग से किन्नर शंकराचार्य की परंपरा बनाना धर्मशास्त्रीय रूप से स्वीकार्य नहीं है। उनका कहना है कि परंपरा के अनुसार केवल चार शंकराचार्य ही मान्य हैं। उन्होंने इस कदम को धार्मिक परंपरा के विपरीत बताते हुए आयोजकों पर आपत्ति जताई और मामले में वैधानिक कार्रवाई की मांग भी की है।
इस घटनाक्रम ने धार्मिक परंपरा, सामाजिक समावेशन और आध्यात्मिक नेतृत्व की नई परिभाषा को लेकर बहस को जन्म दिया है। एक ओर इसे किन्नर समुदाय की धार्मिक भागीदारी के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर परंपरा बनाम परिवर्तन का सवाल भी सामने आ गया है। पुष्कर पीठ से जुड़कर हिमांगी सखी का यह नया अध्याय आने वाले समय में व्यापक धार्मिक और सामाजिक विमर्श को प्रभावित कर सकता है।