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31 साल बाद घर लौटा बिछड़ा बेटा! मां ने आंख के ऊपर पुराने निशान से पहचाना, पिंटू यादव 'अब्दुल जब्बार' के नाम से जी रहा था जिंदगी

बिहार के कटिहार में 31 साल पहले ट्रेन में बिछड़ा पिंटू यादव अब्दुल जब्बार के नाम से अपने परिवार से मिला। मां मीणा देवी ने आंख के ऊपर बचपन के पुराने निशान से बेटे को पहचान लिया। जानिए इस भावुक मिलन की पूरी कहानी।
31 साल बाद घर लौटा बिछड़ा बेटा! मां ने आंख के ऊपर पुराने निशान से पहचाना, पिंटू यादव 'अब्दुल जब्बार' के नाम से जी रहा था जिंदगी
31 साल बाद घर लौटा पिंटू यादव, मां ने निशान से पहचाना

बिहार के कटिहार जिले से एक ऐसी भावुक कहानी सामने आई है, जिसे सुनकर किसी की भी आंखें नम हो सकती हैं। करीब 31 साल पहले महज 8 साल की उम्र में ट्रेन में बिछड़ा पिंटू यादव आखिरकार अपने परिवार से मिल गया। इतने सालों में उसकी पहचान बदलकर अब्दुल जब्बार हो गई, लेकिन अपने असली परिवार को खोजने की चाह कभी खत्म नहीं हुई। जब वह कटिहार के मनिहारी प्रखंड स्थित कांटाकोष गांव पहुंचा, तो मां मीणा देवी ने आंख के ऊपर बचपन के पुराने कट के निशान से उसे पहचान लिया। मां-बेटे का यह मिलन पूरे गांव में चर्चा का विषय बन गया।

8 साल की उम्र में ट्रेन में बिछड़ गया था पिंटू यादव

यह कहानी करीब 1995 की बताई जा रही है। उस समय पिंटू यादव की उम्र महज 8 साल थी। जानकारी के मुताबिक, वह अपने दोस्तों के साथ कांटाकोष रेलवे स्टेशन पहुंचा था। इसी दौरान वह ट्रेन में सवार हो गया और नींद आने के कारण अपने घर से दूर पश्चिम बंगाल के राधिकापुर पहुंच गया। छोटी उम्र में घर से दूर हो जाने के बाद पिंटू अपने परिवार से संपर्क खो बैठा। उसे अपने गांव, पिता और घर से जुड़ी कुछ पुरानी बातें याद थीं, लेकिन इतने कम उम्र में बिछड़ जाने के कारण अपने परिवार तक पहुंचना आसान नहीं था। एक ओर परिवार अपने बिछड़े बच्चे से दूर हो गया, तो दूसरी ओर पिंटू की जिंदगी ने एक नया रास्ता पकड़ लिया। समय बीतता गया और बचपन की यादें ही उसके लिए अपने असली परिवार तक पहुंचने का सहारा बनी रहीं।

अब्दुल रहीम ने दिया सहारा, बदल गई पहचान

पश्चिम बंगाल के राधिकापुर पहुंचने के बाद अब्दुल रहीम नाम के व्यक्ति ने पिंटू को सहारा दिया और उसका पालन-पोषण किया। धीरे-धीरे पिंटू की पहचान बदलकर अब्दुल जब्बार हो गई। उसने इसी नाम से अपनी जिंदगी आगे बढ़ाई। समय के साथ उसकी शादी मुतेना खातून से हुई। आज वह दो बेटों और एक बेटी का पिता है। उसकी जिंदगी में परिवार और जिम्मेदारियां बढ़ती गईं, लेकिन बचपन में छूट गए अपने परिवार की याद उसके मन में बनी रही। अब्दुल जब्बार के लिए यह सिर्फ पुराने दिनों को याद करने का मामला नहीं था। वह अपने असली माता-पिता और गांव को ढूंढना चाहता था। उसे अपने पिता का नाम मोतीलाल यादव और गंगा किनारे बसे गांव की याद थी। इन्हीं अधूरी यादों के सहारे उसने अपने परिवार की तलाश जारी रखी।

दिल्ली में मजदूरी के दौरान शुरू की परिवार की तलाश

अपने असली परिवार को खोजने की कोशिश में अब्दुल जब्बार ने हार नहीं मानी। जानकारी के मुताबिक, दिल्ली में मजदूरी करने के दौरान एक दोस्त ने उसकी मदद की। इसके बाद सोशल मीडिया के जरिए अपने गांव और परिवार का पता लगाने की कोशिश शुरू हुई। आज के दौर में सोशल मीडिया लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने का बड़ा माध्यम बन चुका है। अब्दुल जब्बार के मामले में भी इसी माध्यम से तलाश को आगे बढ़ाने में मदद मिली। उसके पास बचपन की कुछ यादें थीं, पिता का नाम था और अपने गांव के बारे में सीमित जानकारी थी। इन संकेतों के आधार पर वह लोगों से पूछताछ करता रहा। कई सालों से मन में दबा अपने परिवार से मिलने का सपना आखिरकार उसे बिहार के कटिहार जिले तक ले आया।

कटिहार के कांटाकोष गांव पहुंचते ही बदली जिंदगी

लगातार तलाश के बाद अब्दुल जब्बार आखिरकार कटिहार जिले के मनिहारी प्रखंड स्थित कांटाकोष गांव पहुंच गया। यही वह गांव था, जहां से करीब 31 साल पहले उसका बचपन और परिवार पीछे छूट गया था। उसके घर लौटने की खबर फैलते ही गांव में लोगों की भीड़ जुटने लगी। परिवार के लिए यह पल यकीन करना मुश्किल कर देने वाला था। जिस बच्चे से बिछड़ने के बाद वर्षों तक दूरी बनी रही, उसके अचानक सामने आ जाने से घर का माहौल भावुक हो गया।

मां ने आंख के ऊपर के निशान से पहचाना अपना बेटा

इस पूरी कहानी का सबसे भावुक पल वह था, जब मां मीणा देवी ने अपने सामने खड़े शख्स को पहचाना। बचपन में पिंटू की आंख के ऊपर कट लगने का निशान था। इतने वर्षों बाद भी मां को वह निशान याद था। बताया जा रहा है कि मीणा देवी ने पुराने निशान को देखते ही अपने बिछड़े बेटे को पहचान लिया। मां ने उसे गले लगा लिया और उनकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। पिता मोतीलाल यादव और भाई ने भी अब्दुल जब्बार को गले लगाकर उसका स्वागत किया। परिवार के लिए यह सिर्फ किसी सदस्य की वापसी नहीं थी, बल्कि तीन दशक से ज्यादा समय से अधूरी रही उम्मीद के पूरा होने जैसा पल था।

Garima Vishwakarma
By Garima Vishwakarma

गरिमा विश्वकर्मा | People’s Institute of Media Studies से B.Sc. Electronic Media की डिग्री | पत्रकार...

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