रायपुर। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों एक अनोखा नजारा देखने को मिल रहा है। पेड़ों से गिरते महुआ के फूल यहां के लोगों के लिए किसी सोने की बारिश से कम नहीं हैं। बालोद जिले के बड़भूम गांव में महुआ संग्रह का काम पूरे जोरों पर है, जहां ग्रामीण सुबह से शाम तक जंगलों और खेतों में महुआ बीनकर अपनी आय बढ़ा रहे हैं। यह सिर्फ एक मौसमी काम नहीं बल्कि यहां के लोगों की जीवनशैली और परंपरा का हिस्सा बन चुका है। खास बात यह है कि बिना किसी बड़ी लागत के यह काम ग्रामीणों के लिए आय का मजबूत जरिया बन गया है।
बड़भूम गांव के रहने वाले श्रीधन बताते हैं कि वे पिछले 15 दिनों से लगातार महुआ फूलों का संग्रह कर रहे हैं। गर्मी का यह मौसम महुआ के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है क्योंकि इसी दौरान पेड़ों से सबसे ज्यादा फूल गिरते हैं। सुबह-सुबह गांव के लोग जंगल और खेतों के आसपास पहुंच जाते हैं और जमीन पर गिरे महुआ फूलों को बीनते हैं। यह काम देखने में आसान लगता है लेकिन इसमें काफी मेहनत और समय लगता है।
पिछले कुछ दिनों में इलाके में उमस बढ़ने के कारण महुआ के फूलों की गिरावट तेज हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि यह मौसम उनके लिए फायदेमंद साबित हो रहा है क्योंकि ज्यादा फूल गिरने से उन्हें अधिक मात्रा में महुआ इकट्ठा करने का मौका मिल रहा है।
महुआ के फूलों को बीनने के बाद सीधे बाजार में नहीं बेचा जाता। पहले इन्हें घर लाकर 2 से 3 दिनों तक धूप में अच्छी तरह सुखाया जाता है। सुखाने के बाद ही महुआ की गुणवत्ता बेहतर होती है और बाजार में इसकी अच्छी कीमत मिलती है। अगर सही तरीके से सुखाया न जाए, तो महुआ खराब भी हो सकता है।
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फिलहाल बाजार में सूखा महुआ करीब 45 रुपए प्रति किलो के भाव से बिक रहा है। यह कीमत भले बहुत ज्यादा न लगे लेकिन ग्रामीणों के लिए यह आय बेहद महत्वपूर्ण है। दिनभर की मेहनत से एक व्यक्ति कई किलो महुआ इकट्ठा कर लेता है, जिससे उसकी रोजमर्रा की जरूरतें आसानी से पूरी हो जाती हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि महुआ से होने वाली कमाई से वे दाल, चावल, तेल, सब्जी और कपड़ों जैसी जरूरी चीजें खरीद पाते हैं। खेती के अलावा यह एक ऐसा साधन है जिसमें ज्यादा निवेश की जरूरत नहीं होती और हर उम्र के लोग इसमें भाग ले सकते हैं।
महुआ कलेक्शन में गांव की महिलाएं और बुजुर्ग भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। यह काम ऐसा है जिसे हर कोई कर सकता है इसलिए पूरे गांव के लोग इसमें शामिल होते हैं। 60 साल से अधिक उम्र के श्रीधन बताते हैं कि वे बचपन से ही यह काम करते आ रहे हैं। उनके लिए यह सिर्फ कमाई का जरिया नहीं बल्कि जीवन का हिस्सा है।
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महुआ संग्रह सिर्फ आर्थिक गतिविधि नहीं बल्कि ग्रामीण संस्कृति और परंपरा का भी अहम हिस्सा है। हर साल गर्मी के मौसम में यह काम शुरू होता है और अक्षय तृतीया तक चलता है। इस दौरान गांव का लगभग हर परिवार इस काम में जुटा रहता है। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती जा रही है।
ग्रामीणों के अनुसार महुआ कलेक्शन का यह सिलसिला अक्षय तृतीया तक जारी रहेगा। इस दौरान सबसे ज्यादा फूल गिरते हैं और ग्रामीणों को ज्यादा कमाई का मौका मिलता है। जैसे-जैसे मौसम बदलता है, महुआ गिरना कम हो जाता है और यह काम धीरे-धीरे खत्म हो जाता है।