नया साल शुरू होने वाला है और हर कोई जनवरी के स्वागत की तैयारी में है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि साल की शुरुआत हमेशा से जनवरी से ही क्यों होती है? क्या 12 महीने शुरू से ही थे? और आखिर महीनों के नाम किस आधार पर रखे गए? आपको जानकर हैरानी होगी कि कभी साल में 12 नहीं, बल्कि सिर्फ 10 महीने हुआ करते थे।
आज हम जिस कैलेंडर का इस्तेमाल करते हैं, वह हमेशा ऐसा नहीं था। कई सदियों पहले साल की शुरुआत जनवरी से नहीं, बल्कि मार्च महीने से मानी जाती थी। उस समय मार्च पहला महीना होता था और दिसंबर साल का आखिरी महीना। रोमन कैलेंडर के शुरुआती दौर में साल में सिर्फ 10 महीने होते थे। माना जाता है कि उस समय एक साल में करीब 310 दिन ही गिने जाते थे। इसी वजह से सितंबर, अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर के नाम आज भी अंकों से जुड़े हुए लगते हैं।
रोमन राजा नुमा पोम्पिलियस ने लगभग 713 ईसा पूर्व में कैलेंडर में बड़ा बदलाव किया। उन्होंने दो नए महीने जोड़े जनवरी और फरवरी। फरवरी को सबसे आखिर में जोड़ा गया था, इसलिए इसे कम दिन मिले। यही वजह है कि आज भी फरवरी में 28 दिन होते हैं और लीप ईयर में 29। हालांकि, इस बदलाव के बाद भी कई धार्मिक और पारंपरिक कैलेंडर आज तक मार्च से ही शुरू होते हैं।
मार्च का नाम रोमन युद्ध देवता मार्स के नाम पर रखा गया था। लेकिन राजा नुमा ने साल की शुरुआत युद्ध के देवता से नहीं, बल्कि शुरुआत के देवता से करने का फैसला लिया।
जनवरी का नाम रोमन देवता जेनस (Janus) के नाम पर पड़ा। मान्यता है कि जेनस के दो चेहरे होते थे एक अतीत की ओर देखता था और दूसरा भविष्य की ओर। इसी सोच के साथ जनवरी को नए साल की शुरुआत का प्रतीक माना गया।
आज दुनिया के 150 से ज्यादा देश ग्रेगोरियन कैलेंडर का इस्तेमाल करते हैं। 1582 में पोप ग्रेगरी ने इसमें सुधार किया, लेकिन मूल ढांचा रोमन और जूलियन कैलेंडर से ही लिया गया। जूलियस सीजर ने 46 ईसा पूर्व में 365 दिनों का साल और हर चार साल में लीप ईयर की व्यवस्था की थी। इसी सिस्टम ने जनवरी और फरवरी को स्थायी रूप से पहले दो महीने बना दिया।