इंदौर का 'मिनी ब्राजील':फुटबॉल का ऐसा जुनून कि हर गली में मिल जाते हैं मेसी, रोनाल्डो और माराडोना

शैलेंद्र वर्मा, इंदौर। भील पल्टन में अंग्रेजों के समय से फुटबॉल खेलने की परंपरा चली आ रही है, जिसे आज तीसरी-चौथी पीढ़ी आगे बढ़ा रही है। सुविधाओं की कमी, बारिश में कीचड़ और लाइट नहीं होने के बावजूद खिलाड़ियों का उत्साह कम नहीं होता। यहां के खिलाड़ी पढ़ाई और नौकरी के बीच भी अभ्यास के लिए समय निकालते हैं। स्थानीय कोच और खिलाड़ी सरकार से मैदान को विकसित करने की मांग कर रहे हैं, ताकि यहां से भविष्य में और अधिक राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तैयार हो सकें।
‘मिनी ब्राजील’ में हर घर में फुटबॉल का जुनून
इंदौर की भील पल्टन के खिलाड़ी फुटबॉल को लेकर बेहद समर्पित हैं। यहां हर घर का बच्चा फुटबॉल के जुनून के साथ पैदा होता है, इसीलिए इस इलाके को ‘मिनी ब्राजील’ भी कहा जाता है। यहां मौजूद सामुदायिक भवन के मैदान में बच्चों से लेकर बड़ों तक, हर उम्र के लोग फुटबॉल खेलते हैं। इसी मैदान से अभ्यास कर यहां के कई खिलाड़ी स्टेट और नेशनल लेवल पर अपनी पहचान बना चुके हैं। इस इलाके की खास बात यह भी है कि जो खिलाड़ी जैसा प्रदर्शन करता है, उसे उसी स्तर के इंटरनेशनल खिलाड़ी के नाम से पुकारा जाता है। यहां आपको कई लोकल रोनाल्डो, माराडोना, मेसी और एमबाप्पे खेलते हुए मिल जाएंगे।
अंग्रेजों के दौर से चली आ रही है फुटबॉल की परंपरा
बताया जाता है कि अंग्रेजों के समय यहां छावनी (पल्टन) ठहरती थी। उस दौर में यहां के स्थानीय लोगों के दादा-परदादा अंग्रेजों के साथ फुटबॉल खेला करते थे। समय के साथ यह खेल यहां की विरासत बन गया। भील पल्टन की तीसरी और चौथी पीढ़ी आज भी उसी परंपरा को आगे बढ़ा रही है। फुटबॉल यहां केवल एक खेल नहीं, बल्कि लोगों की पहचान और संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। यही वजह है कि नई पीढ़ी भी पूरे समर्पण के साथ इस खेल से जुड़ी हुई है।
कीचड़ और खराब मैदान के बावजूद नहीं रुकती प्रैक्टिस
सुविधाओं के नाम पर इस मैदान में आज भी कई कमियां हैं। सामुदायिक भवन के इस ग्राउंड में सुबह छोटे बच्चे और शाम 5 से 7 बजे तक सीनियर खिलाड़ी अभ्यास करते हैं। यहां रोज 20 से अधिक बच्चे पसीना बहाते हैं। बरसात के दिनों में मैदान में पानी और कीचड़ भर जाता है। पहले यहां लकड़ी गाड़कर गोल पोस्ट बनाए गए थे, जिन्हें अब बदलकर लोहे के अस्थायी पोल का रूप दिया गया है। मैदान की खराब स्थिति के कारण कई खिलाड़ियों को प्रैक्टिस के लिए स्टेडियम भी जाना पड़ता है।
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मैदान से निकले नेशनल खिलाड़ी
तमाम दिक्कतों के बावजूद इस मैदान ने देश को कई बेहतरीन खिलाड़ी दिए हैं। यहां से खेलकर आकाश भाबोर, संदीप सिंह डामोर और कई अन्य खिलाड़ी स्टेट लेवल तक पहुंचे हैं। आकाश भाबोर प्रतिष्ठित संतोष ट्रॉफी में भी हिस्सा ले चुके हैं और वर्तमान में एनआईएस कोच होने के साथ रायसेन में शिक्षा विभाग में पदस्थ हैं। इनके अलावा शिव कुमार भागवत, राजू बीरबल, रोहित बामनिया, ध्यान सिंह, रमेश झिरवाड और दीपक मालवीय जैसे खिलाड़ियों ने नेशनल और ऑल इंडिया टूर्नामेंट में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। यह मैदान लगातार प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने का काम कर रहा है। यहां से निकलने वाले खिलाड़ी प्रदेश का नाम रोशन कर रहे हैं।

कोच और खिलाड़ियों ने सरकार से की मैदान विकसित करने की मांग
कोच शिव कुमार भाबोर का कहना है कि मैदान की स्थिति अच्छी नहीं है, लेकिन खिलाड़ियों के जुनून में कोई कमी नहीं है। यहां के युवा पढ़ाई और नौकरी के व्यस्त शेड्यूल के बीच भी फुटबॉल के लिए समय निकालते हैं। इसी के साथ कोच संदीप मसार ने बताया कि कई बार पार्षद से मैदान में लाइट लगाने का आश्वासन मिला, लेकिन अब तक व्यवस्था नहीं हो सकी है। बारिश के दौरान मैदान में कीचड़ भर जाने से अभ्यास रोकना पड़ता है, जबकि यहां फुटबॉल एकेडमी भी संचालित हो रही है। खिलाड़ी शरद परमार ने प्रदेश सरकार से इस मैदान को विकसित कराने की मांग करते हुए कहा कि बच्चे रातभर जागकर विश्व कप के मुकाबले देखते हैं और फुटबॉल के प्रति उनका समर्पण अद्भुत है। उनका कहना है कि यदि मैदान की सुविधाएं बेहतर हों, तो यहां से भविष्य में और भी राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी निकल सकते हैं।












