भारत को मिली 11वीं सदी की चोल विरासत!नीदरलैंड ने लौटाए प्राचीन ताम्र-पत्र, PM मोदी ने कहा- 'हर भारतीय के लिए गर्व का पल'

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीदरलैंड यात्रा के दौरान भारत के लिए एक बड़ा सांस्कृतिक और भावनात्मक पल सामने आया। शनिवार का दिन भारतीय इतिहास और विरासत के लिए खास बन गया, जब नीदरलैंड सरकार ने 11वीं सदी के चोल काल के तांबे के शिलालेख भारत को वापस सौंप दिए। ये सिर्फ धातु की प्लेटें नहीं हैं, बल्कि हजार साल पुरानी सभ्यता, प्रशासन और समुद्री शक्ति की जीवित कहानी हैं।
क्या हैं ये चोल काल के ताम्र-पत्र?
इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को 'अनैमंगलम ताम्रपट्टिकाएं' या 'लाइडेन प्लेट्स' के नाम से भी जाना जाता है। ये 11वीं सदी के चोल साम्राज्य से जुड़े शाही आदेशों का संग्रह हैं। कुल 24 ताम्र-पत्र है जिनमें 21 बड़े और 3 छोटे शिलालेख है जो तमिल भाषा में खुदे हुए लेख। पूरे सेट का लगभग 30 किलो वजन है।
इन पर जमीनों के अधिकार, प्रशासनिक आदेश और शाही घोषणाएं दर्ज हैं। यह उस दौर की मजबूत शासन व्यवस्था का प्रमाण हैं, जब रिकॉर्ड को स्थायी बनाने के लिए तांबे जैसी धातु का उपयोग किया जाता था।
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चोल साम्राज्य की ताकत और विरासत
ये ताम्र-पत्र चोल राजवंश की महानता को दर्शाते हैं। इनका संबंध सम्राट राजेंद्र चोल प्रथम और उनके पिता राजराजा चोल प्रथम के समय से है। चोल साम्राज्य सिर्फ एक राज्य नहीं था, बल्कि एक समुद्री शक्ति थी, जिसने दक्षिण भारत से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक अपना प्रभाव बनाया।
ताम्र-पत्रों में चोल प्रतीकों का भी उल्लेख मिलता है-
- बाघ: चोल शक्ति का प्रतीक
- दो मछलियां: पांड्य राजवंश की विजय
- धनुष: चेर वंश का संकेत
- शाही छत्र: राजकीय सत्ता का प्रतीक
PM मोदी ने कहा- गर्व और भावनाओं का क्षण
इस ऐतिहासिक वापसी के मौके पर PM मोदी ने नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटेन की मौजूदगी में इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर तमिल भाषा में संदेश साझा करते हुए कहा कि यह हर भारतीय के लिए गर्व का क्षण है।
PM मोदी ने कहा कि ये ताम्र-पत्र चोल साम्राज्य की महानता, उनकी प्रशासनिक क्षमता और समुद्री शक्ति का प्रमाण हैं। उन्होंने यह भी बताया कि इनमें से अधिकतर लेख तमिल भाषा में हैं, जो दुनिया की सबसे प्राचीन और समृद्ध भाषाओं में से एक है।
नीदरलैंड का ऐतिहासिक कदम और सांस्कृतिक सहयोग
इन शिलालेखों को लंबे समय तक लीडेन विश्वविद्यालय में संरक्षित रखा गया था। 19वीं सदी के मध्य से ये दस्तावेज वहीं सुरक्षित थे। नीदरलैंड ने यह कदम अपनी नई सांस्कृतिक नीति के तहत उठाया है, जिसमें औपनिवेशिक काल के दौरान ली गई सांस्कृतिक वस्तुओं को उनके मूल देशों को लौटाने की बात शामिल है।
कैसे विदेश पहुंचे थे ये ताम्र-पत्र?
इतिहास के अनुसार, ये ताम्र-पत्र लगभग ढाई सौ साल पहले औपनिवेशिक काल के दौरान भारत से बाहर चले गए थे। बाद में 1862 में डच विद्वान हेंड्रिक एरेंट हैमेकर की वसीयत के माध्यम से ये लाइडेन यूनिवर्सिटी को सौंप दिए गए। तब से ये दस्तावेज यूरोप में सुरक्षित रखे गए और अंतरराष्ट्रीय इतिहासकारों के अध्ययन का महत्वपूर्ण हिस्सा बने रहे।
भारत-नीदरलैंड साझेदारी
इस यात्रा के दौरान भारत और नीदरलैंड के बीच कई अहम समझौते भी हुए। दोनों देशों ने निवेश, तकनीक और सेमीकंडक्टर सेक्टर में सहयोग को मजबूत करने पर फोकस किया।
एक महत्वपूर्ण समझौता भारत की टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और नीदरलैंड की सेमीकंडक्टर कंपनी ASML के बीच हुआ। यह समझौता सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग को भारत में नई रफ्तार देने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
क्यों खास हैं ये ताम्र-पत्र?
इन दस्तावेजों का महत्व सिर्फ इतिहास तक सीमित नहीं है। बल्कि ये प्रशासनिक प्रणाली का प्राचीन प्रमाण हैं, तमिल भाषा की समृद्ध परंपरा दिखाते हैं, चोल साम्राज्य की समुद्री ताकत को दर्शाते हैं और भारत की वैश्विक पहचान को मजबूत करते हैं।











