बदलता भारत:1951 की पहली गिनती से 2026 की तस्वीर तक

भारत जैसे विशाल देश में जनगणना सिर्फ आंकड़ों का काम नहीं है, बल्कि यह देश की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति का आईना भी होती है। आज भारत की आबादी 147 करोड़ से ज्यादा मानी जा रही है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब देश की कुल जनसंख्या 40 करोड़ से भी कम थी। आज के दिन यानी 9 फरवरी 1951 को आजाद भारत की पहली जनगणना की शुरुआत हुई थी, जिसने देश की असली तस्वीर दुनिया के सामने रखी।
कब हुई थी पहली जनगणना?
आजादी के बाद पहली बार पूरे देश में साल 1951 में जनगणना कराई गई। यह प्रक्रिया 9 फरवरी से शुरू होकर 28 फरवरी तक चली थी। इसके बाद 1 मार्च से 3 मार्च तक आंकड़ों का पुनरीक्षण किया गया।
इस जनगणना में लोगों से कई तरह की जानकारियां ली गई थीं। इसमें नाम, परिवार से संबंध, जन्म स्थान, उम्र, लिंग, आर्थिक स्थिति, रोजगार के साधन, धर्म, मातृभाषा और साक्षरता जैसे सवाल शामिल थे। उस समय यह काम आसान नहीं था, क्योंकि देश हाल ही में आजाद हुआ था और विभाजन के कारण बड़ी संख्या में लोगों का पलायन हुआ था। सीमाएं बदली थीं और आबादी का धार्मिक संतुलन भी बदल चुका था। ऐसे में 1951 की जनगणना को बेहद अहम माना गया।
1951 में कितनी थी भारत की आबादी?
1951 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल आबादी 36,10,88,090 दर्ज की गई थी। उस समय देश में साक्षरता दर केवल 18 प्रतिशत थी। यानी हर 100 लोगों में से सिर्फ 18 लोग पढ़े-लिखे थे। औसत जीवन प्रत्याशा भी काफी कम थी। उस समय भारत में लोगों की औसत उम्र करीब 32 साल मानी जाती थी। लिंगानुपात की बात करें तो प्रति 1000 पुरुषों पर 946 महिलाएं थीं।
धार्मिक आधार पर देखें तो उस समय देश की आबादी में 84.1 प्रतिशत हिंदू, 9.8 प्रतिशत मुस्लिम, 2.3 प्रतिशत ईसाई और 1.9 प्रतिशत सिख थे। बाकी आबादी अन्य धर्मों से जुड़ी थी।
आज कितनी है भारत की आबादी?
आजादी के बाद से भारत की आबादी लगातार बढ़ती रही है। वर्तमान में भारत दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन चुका है। कई रिपोर्ट्स के मुताबिक देश की आबादी 147 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार हर साल देश की जनसंख्या में करीब 1.5 करोड़ लोगों की बढ़ोतरी होती है। दुनिया की कुल आबादी का लगभग 17% हिस्सा भारत में रहता है।
साक्षरता दर में भी बड़ा बदलाव आया है। जहां 1951 में यह केवल 18% थी, वहीं अब यह 80 प्रतिशत से ज्यादा हो चुकी है। धर्म के आधार पर 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 79.8% हिंदू, 14.2 प्रतिशत मुस्लिम, 2.38% ईसाई और 1.7% सिख आबादी है।
भारत में जनगणना का इतिहास
भारत में हर 10 साल में जनगणना कराई जाती है। आखिरी बार यह प्रक्रिया साल 2011 में हुई थी। इसके बाद 2021 में जनगणना होनी थी, लेकिन कोरोना महामारी और अन्य कारणों की वजह से इसमें देरी हो गई।
अगर इतिहास की बात करें, तो भारत में जनगणना की परंपरा बहुत पुरानी है। प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी जनसंख्या के लेखे-जोखे का जिक्र मिलता है। मुगल काल में अकबर के समय लिखी गई ‘आईन-ए-अकबरी’ में भी जनगणना जैसी व्यवस्था का वर्णन मिलता है।
ब्रिटिश शासन के दौरान 1872 में वायसराय लॉर्ड मेयो ने पहली बार देश में जनगणना कराई थी। इसके बाद नियमित जनगणना की व्यवस्था शुरू हुई और हर 10 साल में यह प्रक्रिया जारी रही।
क्यों जरूरी है जनगणना?
जनगणना से सरकार को यह पता चलता है कि देश में कितने लोग हैं, उनकी उम्र क्या है, वे क्या काम करते हैं, कितने लोग पढ़े-लिखे हैं और किस धर्म या भाषा से जुड़े हैं। इन आंकड़ों के आधार पर सरकार योजनाएं बनाती है और संसाधनों का सही बंटवारा करती है।
1951 से लेकर आज तक जनसंख्या के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर में भी बड़ा बदलाव आया है।




















