PU Special :ग्वालियर के सुसेरा गांव में झाड़ू के कारोबार से चमकी किस्मत, 150 घरों में सालाना 3 करोड़ का व्यापार

ग्वालियर के सुसेरा गांव में चार पीढ़ियों से झाड़ू बनाने का काम हो रहा है। 150 घरों के करीब 2500 लोग इस पारंपरिक कारोबार से जुड़े हैं, जिसका सालाना कारोबार करीब 3 करोड़ रुपये है।
ग्वालियर के सुसेरा गांव में झाड़ू के कारोबार से चमकी किस्मत, 150 घरों में सालाना 3 करोड़ का व्यापार
सेरा गांव में झाड़ू के कारोबार से चमकी किस्मत

रघुवीर कुशवाह, ग्वालियर। किसी गांव की पहचान खेती-किसानी, पशुपालन या किसी पारंपरिक व्यवसाय से होती है, लेकिन ग्वालियर के सुसेरा गांव की पहचान झाड़ू बनाने के हुनर से है। यहां करीब 150 घरों में चार पीढ़ियों से खजूर की पत्तियों से झाड़ू बनाने का काम हो रहा है। लगभग 2500 की आबादी वाले इस गांव में बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग तक इस कारोबार से जुड़े हैं। गांव के लोगों के मुताबिक, यहां सालाना करीब तीन करोड़ रुपये का कारोबार होता है। दीपावली के आसपास झाड़ू की मांग बढ़ने से कारोबार में तेजी आ जाती है। दिलचस्प बात यह है कि गांव में झाड़ू बनाने का काम किसी एक समय तक सीमित नहीं है बल्कि यहां 24 घंटे गतिविधियां चलती रहती हैं। चार पीढ़ियों से चले आ रहे इस पारंपरिक काम ने अब सुसेरा की अर्थव्यवस्था की रीढ़ का रूप ले लिया है। किसी के जिम्मे खजूर की पत्तियां काटकर लाने की जिम्मेदारी है, तो कोई उन्हें सुखाता है। कुछ लोग पत्तियों को चीरने और साफ करने का काम करते हैं, जबकि दूसरे लोग झाड़ू बांधने और तैयार माल की सफाई में जुटे रहते हैं। इस तरह परिवार का लगभग हर सदस्य अपनी क्षमता और अनुभव के अनुसार कारोबार में योगदान देता है।

चार पीढ़ियां, एक ही हुनर: विरासत से मिला रोजगार

सुसेरा की गलियों में झाड़ू बनाना केवल कमाई का जरिया नहीं, बल्कि पारिवारिक विरासत बन चुका है। यहां एक ही परिवार के बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक इस काम में हाथ बंटाते हैं। इंदु बाई (70), अनीता (48) और रोहित (15) इसकी मिसाल हैं। एक ही परिवार की ये तीन पीढ़ियां झाड़ू बनाने के काम से जुड़ी हैं। बुजुर्ग महिलाओं के हाथों में वर्षों का अनुभव है, जबकि नई पीढ़ी इसी हुनर को सीखकर आगे बढ़ा रही है। गांव में करीब 450 युवा और 500 महिलाएं इस काम से जुड़ी बताई जाती हैं। बुजुर्गों की भागीदारी भी बड़ी संख्या में है। ग्रामीणों के मुताबिक यहां झाड़ू बनाने वाले समूहों की संख्या करीब 100 है। इस कारोबार की खासियत यह है कि इसमें उम्र कोई बाधा नहीं है। हर पीढ़ी अपने अनुभव और कौशल को अगली पीढ़ी तक पहुंचा रही है।

खजूर की पत्तियों से तैयार होती है झाड़ू, कई चरणों से गुजरता है काम

सुसेरा में झाड़ू बनाने के लिए कच्चा माल मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के रानीपुर, झांसी से आता है। ग्रामीण खुद भी खजूर की पत्तियां लाने के लिए जाते हैं। एक गाड़ी में करीब 500 बंडल पत्तियां लाई जाती हैं। एक बंडल से लगभग 30 झाड़ू तैयार होती हैं। गांव पहुंचने के बाद पत्तियों को सबसे पहले सुखाया जाता है। इसके बाद उन्हें बांधने, कांटा झाड़ने, चीरने और फटकारने का काम किया जाता है। फिर पत्तियों को रस्सी से कसकर बांधा जाता है। अंतिम चरण में उनकी सफाई और छंटाई के बाद झाड़ू तैयार होती है। इस पूरी प्रक्रिया में परिवार के लगभग सभी सदस्य अपनी भूमिका निभाते हैं। कच्चे माल को तैयार उत्पाद में बदलने के लिए अलग-अलग चरणों में मेहनत करनी पड़ती है। यही वजह है कि गांव में दिन-रात झाड़ू बनाने का काम चलता रहता है।

सालभर में आते हैं 400 ट्रक कच्चा माल, 1000 ट्रक झाड़ू की सप्लाई

सुसेरा के झाड़ू कारोबार का दायरा केवल गांव या ग्वालियर तक सीमित नहीं है। यहां सालभर में करीब 400 से अधिक ट्रक कच्चा माल पहुंचता है, जबकि तैयार झाड़ुओं के लगभग 1000 ट्रक गांव से बाहर भेजे जाते हैं। मध्यप्रदेश के ग्वालियर, भिंड, सबलगढ़ और श्योपुर के बाजारों में यहां बनी झाड़ुओं की मांग रहती है। दीपावली के दौरान कारोबार का दायरा और बढ़ जाता है। इस दौरान सुसेरा की झाड़ू उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, इटावा, फिरोजाबाद, शिकोहाबाद और मथुरा तक पहुंचती हैं। राजस्थान के बाड़ी, सरमथुरा और करौली के बाजारों में भी इनकी सप्लाई की जाती है। इस तरह सुसेरा में तैयार होने वाली झाड़ुएं मध्यप्रदेश के साथ उत्तर प्रदेश और राजस्थान के बाजारों तक पहुंच रही हैं।

एक ट्रक में 150 बोरे, हर बोरे में करीब 200 झाड़ू

तैयार झाड़ुओं को ट्रकों के जरिए बाजारों तक पहुंचाया जाता है। एक ट्रक में करीब 150 बोरे लोड किए जाते हैं और एक बोरे में लगभग 200 झाड़ू रखी जाती हैं। इस तरह एक ट्रक में करीब 30 हजार झाड़ुओं की सप्लाई होती है। कीमतों की बात करें तो सामान्य दिनों में एक बोरे की कीमत करीब 2500 से 3000 रुपये रहती है। वहीं, दीपावली जैसे सीजन में मांग बढ़ने पर यही कीमत बढ़कर 4000 से 5000 रुपये तक पहुंच जाती है। त्योहार के दौरान बाजारों में बढ़ती मांग का सीधा फायदा सुसेरा के झाड़ू कारोबार से जुड़े परिवारों को मिलता है।

सालाना तीन करोड़ तक पहुंचता है व्यापार

सुसेरा के लोगों के मुताबिक एक परिवार सालभर में औसतन दो लाख रुपये तक का माल बेचता है। गांव में करीब 150 घर इस कारोबार से जुड़े हैं। इस हिसाब से सभी परिवारों का कुल सालाना कारोबार करीब तीन करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। गांव के निवासी मनीष दिनकर बताते हैं कि झाड़ू बनाने के इस काम में मेहनत सबसे ज्यादा है। खजूर की पत्तियां काटने से लेकर उन्हें गांव तक लाने और फिर उनसे झाड़ू तैयार करने तक कई चरणों से गुजरना पड़ता है। हर चरण में परिवार के सदस्यों की भागीदारी रहती है। ग्रामीणों के अनुसार इस काम से एक व्यक्ति को प्रतिदिन करीब 1000 से 1200 रुपये तक की आय हो जाती है। यही वजह है कि गांव के लोगों के लिए यह कारोबार रोजगार का बड़ा साधन बन गया है।

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दीपावली पर बढ़ती मांग से गांव में बढ़ जाती है रौनक

दीपावली के दौरान घरों की साफ-सफाई और खरीदारी के चलते झाड़ू की मांग बढ़ जाती है। इसका असर सुसेरा के कारोबार पर भी दिखाई देता है। सामान्य दिनों की तुलना में सीजन में झाड़ुओं के दाम बढ़ जाते हैं और तैयार माल की सप्लाई में तेजी आती है।

Dr. Sumit  Shrivastava
By Dr. Sumit Shrivastava

सुमित श्रीवास्तव एक अनुभवी मीडिया प्रोफेशनल, बिजनेस पत्रकार और शोधकर्ता हैं। मास कम्युनिकेशन में M.P...

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