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PU Special :डेढ़ साल में लोकायुक्त ने पकड़े 37 रिश्वतखोर, 15 मामलों में चार्जशीट अभियोजन स्वीकृति के इंतजार में

ग्वालियर-चंबल संभाग में लोकायुक्त ने 19 महीनों में 37 अधिकारी-कर्मचारियों को रिश्वत लेते पकड़ा। इनमें 19 राजस्व विभाग से जुड़े हैं। करीब 15 मामले अभियोजन स्वीकृति के इंतजार में अटके हैं जिससे चार्जशीट दाखिल नहीं हो सकी।
डेढ़ साल में लोकायुक्त ने पकड़े 37 रिश्वतखोर, 15 मामलों में चार्जशीट अभियोजन स्वीकृति के इंतजार में
डेढ़ साल में लोकायुक्त ने पकड़े 37 रिश्वतखो

तुषांत पांडे, ग्वालियर। ग्वालियर-चंबल संभाग में रिश्वतखोरी के खिलाफ लोकायुक्त की कार्रवाई लगातार तेज रही है। पिछले करीब 19 महीनों में लोकायुक्त ने विभिन्न विभागों के 37 अधिकारी-कर्मचारियों को रिश्वत लेते हुए रंगेहाथ पकड़ा। इनमें सबसे ज्यादा मामले राजस्व विभाग से जुड़े रहे। कुल 37 आरोपियों में 19 राजस्व विभाग के अधिकारी-कर्मचारी हैं, यानी लोकायुक्त के लगभग हर दूसरे ट्रैप का संबंध राजस्व विभाग से रहा। हालांकि, रिश्वत लेते रंगेहाथ पकड़े जाने के बाद इन मामलों को अदालत तक पहुंचाने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी बनी हुई है। करीब 15 प्रकरण अभियोजन स्वीकृति के इंतजार में अटके हुए हैं, जिसके कारण इनमें न्यायालय में चार्जशीट पेश नहीं हो सकी है। वहीं अन्य मामलों में लोकायुक्त की विवेचना की प्रक्रिया जारी है।

नामांतरण और सीमांकन से लेकर भुगतान तक रिश्वत के मामले

लोकायुक्त की कार्रवाई में सामने आए मामलों से पता चलता है कि राजस्व विभाग में जमीन और रिकॉर्ड से जुड़े कामों को लेकर रिश्वत की शिकायतें अधिक रहीं। नामांतरण, सीमांकन, रिकॉर्ड में नाम सुधार और अन्य राजस्व कार्यों के बदले रिश्वत मांगने के मामले सामने आए। इसके अलावा नगर निगम से जुड़े मामलों में ठेकेदारों के भुगतान और फाइलों को आगे बढ़ाने के बदले रिश्वत लेने के आरोपों पर कार्रवाई हुई। लोकायुक्त के ट्रैप की कार्रवाई पुलिस, पंचायत, कृषि, वन, शिक्षा, महिला एवं बाल विकास तथा नापतौल विभाग तक भी पहुंची।

राजस्व विभाग सबसे आगे, नगर निगम दूसरे स्थान पर

पिछले करीब डेढ़ साल में लोकायुक्त ग्वालियर संभाग द्वारा रिश्वत लेते पकड़े गए अधिकारी-कर्मचारियों की विभागवार स्थिति में राजस्व विभाग सबसे आगे रहा। राजस्व विभाग के 19 अधिकारी-कर्मचारी, नगर निगम के 7, पंचायत विभाग के 3, पुलिस विभाग के 2, कृषि विभाग के 2, जबकि वन, महिला एवं बाल विकास, शिक्षा और नापतौल विभाग के एक-एक कर्मचारी या अधिकारी लोकायुक्त के ट्रैप में पकड़े गए। इस तरह कुल 37 अधिकारी-कर्मचारियों के खिलाफ रिश्वत लेने के मामलों में कार्रवाई की गई।

ट्रैप के बाद अभियोजन स्वीकृति विभाग के हाथ में

लोकायुक्त की कार्रवाई रिश्वत लेते आरोपी को रंगेहाथ पकड़ने तक सीमित नहीं रहती। ट्रैप के बाद मामले की जांच और विवेचना पूरी की जाती है। इसके बाद आरोपी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ अदालत में अभियोजन चलाने के लिए संबंधित विभाग से अभियोजन स्वीकृति मांगी जाती है। यह स्वीकृति देने का अधिकार संबंधित विभाग के सक्षम प्राधिकारी के पास होता है। लोकायुक्त अधिकारियों के अनुसार, जिन मामलों में स्वीकृति मिलने में देरी होती है, उनमें संबंधित विभागों को समय-समय पर रिमाइंडर भी भेजे जाते हैं। यही प्रक्रिया कई मामलों में अदालत तक पहुंचने में देरी का कारण बन रही है।

प्रदेश में भी सैकड़ों मामले मंजूरी के इंतजार में

लोकायुक्त के प्रदेश स्तरीय आंकड़े भी अभियोजन स्वीकृति की समस्या को सामने लाते हैं। 21 जून 2026 तक लोकायुक्त ने जांच पूरी होने के बाद कुल 1,302 मामलों में अभियोजन स्वीकृति के लिए प्रस्ताव भेजे थे। इनमें से 985 मामलों में अभियोजन की अनुमति मिल चुकी थी, जबकि 295 मामले अभी भी स्वीकृति के इंतजार में थे। इससे स्पष्ट है कि जांच पूरी होने के बावजूद बड़ी संख्या में मामले विभागीय स्तर पर मंजूरी न मिलने के कारण आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।

अभियोजन स्वीकृति के बिना नहीं बढ़ पाती चार्जशीट की प्रक्रिया

जिन मामलों में कानून के तहत अभियोजन स्वीकृति आवश्यक होती है, उनमें यह अनुमति मिलने के बाद ही लोकायुक्त न्यायालय में चार्जशीट दाखिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है। इसी कारण कई मामलों में आरोपी के रिश्वत लेते पकड़े जाने और अदालत में मुकदमा शुरू होने के बीच लंबा अंतर आ जाता है। हालांकि किसी ट्रैप कार्रवाई में पकड़े जाने मात्र से आरोपी दोषी साबित नहीं होता। मामले में अंतिम निर्णय और दोषसिद्धि का अधिकार न्यायालय के पास ही रहता है।

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2023-24 के 19 मामलों में चालान पेश

लोकायुक्त ग्वालियर ने वर्ष 2023 और 2024 में दर्ज रिश्वतखोरी के मामलों में जांच पूरी होने और अभियोजन स्वीकृति मिलने के बाद करीब 19 प्रकरणों में चालान पेश कर दिए हैं। वहीं पिछले करीब डेढ़ साल में दर्ज मामलों में लगभग 22 प्रकरणों की विवेचना अभी जारी है। इसके अलावा कई मामले अभियोजन स्वीकृति मिलने की प्रक्रिया में अटके हुए हैं।

अभियोजन स्वीकृति के लिए 120 दिन का प्रावधान

रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में अभियोजन स्वीकृति को लेकर कानून में समयसीमा का भी प्रावधान है। बीएनएसएस के तहत संबंधित विभाग को 120 दिन के भीतर अभियोजन स्वीकृति से जुड़ी रिपोर्ट देने का प्रावधान बताया गया है। यदि तय समय में निर्णय नहीं लिया जाता है तो कुछ परिस्थितियों में मामले के लंबित रहने के उचित कारण भी दर्ज किए जाने होते हैं। इसके बावजूद अभियोजन स्वीकृति में होने वाली देरी कई मामलों में चार्जशीट दाखिल होने और मुकदमे की प्रक्रिया शुरू होने में बाधा बन रही है।

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मामलों की विवेचना जारी

लोकायुक्त एसपी निरंजन शर्मा ने कहा कि पिछले करीब डेढ़ वर्ष के दौरान दर्ज मामलों में कई प्रकरण अभियोजन स्वीकृति के कारण आगे नहीं बढ़ पाए हैं जबकि अन्य मामलों में विवेचना की प्रक्रिया जारी है।

Sumit  Shrivastava
By Sumit Shrivastava

सुमित श्रीवास्तव एक अनुभवी मीडिया प्रोफेशनल, बिजनेस पत्रकार और शोधकर्ता हैं। मास कम्युनिकेशन में M.P...Read More

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