अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर तनाव तेजी से बढ़ गया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि दोनों देशों के बीच टकराव का असर अब सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और आम लोगों की जेब पर पड़ने लगा है। शांति की कोशिशें फेल होने के बाद दोनों देशों के बीच बयानबाजी तेज हो गई है और हालात धीरे-धीरे गंभीर होते जा रहे हैं।
हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई और यह वार्ता फेल हो गई। इससे पहले दोनों देशों के बीच सीमित स्तर पर सीजफायर जैसी स्थिति बनी थी, लेकिन वह ज्यादा समय तक टिक नहीं सकी। वार्ता टूटने के बाद दोनों तरफ से सख्त बयान आने लगे हैं और तनाव तेजी से बढ़ा है।
अमेरिका की ओर से ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए एक नई रणनीति की बात सामने आई है। इसमें समुद्री रास्तों और बंदरगाहों पर सख्ती की योजना शामिल बताई जा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह कदम ईरान के समुद्री व्यापार और तेल सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकता है। इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज है।
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ईरान ने अमेरिका की इस रणनीति पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरानी संसद के वरिष्ठ अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर कलीबाफ ने सख्त लहजे में चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि अब आपको 4-5 डॉलर में मिलने वाले पेट्रोल की याद आएगी। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा पेट्रोल की कीमतों का आनंद लीजिए। इस नाकाबंदी के चलते जल्द ही आपको 4-5 डॉलर में मिलने वाले पेट्रोल की याद आएगी। उनके इस बयान के बाद वैश्विक तेल बाजार में चिंता और बढ़ गई है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल और ऊर्जा आपूर्ति इसी समुद्री रास्ते से होकर गुजरती है। यही वजह है कि यहां किसी भी तरह की रुकावट या तनाव सीधे वैश्विक तेल कीमतों को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तो इसका असर सिर्फ कुछ देशों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था प्रभावित होगी।
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अमेरिका की सैन्य कमान United States Central Command इस पूरे क्षेत्र में हालात पर नजर बनाए हुए है। रिपोर्ट्स के अनुसार समुद्री मार्गों और बंदरगाहों की गतिविधियों की लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया दी जा सके।
रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया जा रहा है कि यह पूरा विवाद सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार समुद्री तेल व्यापार में डॉलर के बजाय चीनी मुद्रा युआन के उपयोग को लेकर भी विवाद जुड़ा हुआ है। इसे अमेरिका अपनी आर्थिक व्यवस्था के लिए चुनौती के रूप में देख रहा है। इसी वजह से यह मामला और ज्यादा जटिल होता जा रहा है।