Manisha Dhanwani
3 Jan 2026
इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से 16 लोगों की मौत के बाद पूरा शहर ही नहीं, बल्कि प्रदेशभर में आक्रोश की लहर फैल गई है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक की मौत ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह कोई साधारण हादसा नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही लापरवाही, अनदेखी और गैर-जिम्मेदार सिस्टम का खौफनाक नतीजा है। इस घटना ने इंदौर के इतिहास की उस डरावनी याद को फिर जिंदा कर दिया है, जब करीब तीन दशक पहले लोग ‘सड़ी-गली लाश’ से दूषित पानी पीने को मजबूर हो गए थे।
भागीरथपुरा में हालात इतने भयावह हैं कि हर गली, हर घर में दहशत पसरी हुई है। दूषित पानी के कारण एक के बाद एक मौतें हुईं, कई लोग अब भी अस्पतालों में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। क्षेत्र में पानी की बदबू, उल्टी-दस्त और तेज बुखार की शिकायतें लगातार सामने आती रहीं, लेकिन जिम्मेदार अफसर आंख मूंदे बैठे रहे। जब तक प्रशासन हरकत में आता, तब तक 16 परिवारों के घरों में मातम पसर चुका था।
इंदौर आज भी भूल नहीं पाया है। करीब 30 साल पहले सुभाष चौक और आसपास के इलाकों में अचानक घर-घर गंदा पानी सप्लाई होने लगा था। लोग एक के बाद एक बीमार पड़ने लगे। किसी को पेट दर्द, किसी को उल्टी-दस्त, तो किसी को तेज बुखार हो रहा था। हर घर में मरीज थे, लेकिन बीमारी की असली वजह किसी को समझ नहीं आ रही थी।
पूर्व विधायक और भाजपा के वरिष्ठ नेता सत्यनारायण सत्तन के अनुसार, जब मामले की गंभीरता को देखते हुए पानी की टंकी की जांच की गई और उसका ढक्कन हटाया गया, तो अंदर का दृश्य देखकर सभी के होश उड़ गए। टंकी के भीतर मानव कंकाल तैर रहा था। उसी टंकी से पूरे इलाके में पानी की सप्लाई हो रही थी। लोग अनजाने में ‘सड़ी-गली लाश’ से दूषित पानी पी रहे थे और रोजमर्रा के कामों में उसका उपयोग कर रहे थे।
उस समय यह किसी चमत्कार से कम नहीं था कि इतनी भयावह लापरवाही के बावजूद किसी की जान नहीं गई। लेकिन इस बार भागीरथपुरा में हालात कहीं ज्यादा खतरनाक साबित हुए। यहां पानी की हालत शौचालय के पानी जैसी बताई जा रही है, जिसने सीधे तौर पर 16 लोगों की जान ले ली। यह फर्क साफ दिखाता है कि हालात कितने बिगड़ चुके हैं और लापरवाही कितनी जानलेवा हो चुकी है।
इस भीषण त्रासदी के बाद कांग्रेस ने सरकार और नगर प्रशासन को घेरते हुए सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन शुरू कर दिया है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि यह मौतें प्राकृतिक नहीं, बल्कि सिस्टम द्वारा की गई ‘प्रशासनिक हत्या’ हैं। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर समय रहते पानी की जांच क्यों नहीं हुई, शिकायतों को गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया और जब हालात बिगड़ रहे थे, तब जिम्मेदार अधिकारी कहां थे।
भागीरथपुरा की ताजा त्रासदी और सुभाष चौक का पुराना कांड एक ही सच्चाई की ओर इशारा करते हैं—पानी की शुद्धता और सप्लाई में जरा सी भी चूक मौत का कारण बन सकती है। यह घटनाएं प्रशासन के लिए सख्त चेतावनी हैं। अगर अब भी सिस्टम नहीं सुधरा, जवाबदेही तय नहीं हुई और जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं की गई, तो इंदौर में ऐसे काले अध्याय बार-बार लिखे जाते रहेंगे, और हर बार इसकी कीमत आम जनता को अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी।