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DRDO का नया मिशन: अब दुश्मन के रडार को पकड़ेगा पोर्टेबल ELINT सिस्टम

हैदराबाद की डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स रिसर्च लेबोरेटरी ने कॉम्पैक्ट इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस मॉड्यूल के लिए टेंडर जारी किया। इसे खास तौर पर दुश्मन के रडार और अन्य एंटीना से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नलों को पकड़ने और उनका विश्लेषण करने के लिए डिजाइन किया गया है।
DRDO का नया मिशन: अब दुश्मन के रडार को पकड़ेगा पोर्टेबल ELINT सिस्टम
फाइल फोटो।

नई दिल्ली। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) अब ऐसे एडवांस इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस (ELINT) मॉड्यूल तैयार करने पर काम कर रहा है, जिन्हें आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकेगा। यह एक कॉम्पैक्ट और पोर्टेबल सिस्टम होगा जिसे खास तौर पर दुश्मन के रडार और अन्य एंटीना से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नलों को पकड़ने और उनका विश्लेषण करने के लिए डिजाइन किया गया है। इस प्रोजेक्ट के लिए हैदराबाद स्थित डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (DLRL) ने टेंडर जारी कर दिया है।

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क्या है ELINT तकनीक और कैसे करेगी काम

इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस (ELINT) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत रडार और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से निकलने वाले सिग्नलों को इंटरसेप्ट कर उनका गहन अध्ययन किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि सामने वाला सिस्टम किस तरह का है और उसकी तकनीकी खूबियां क्या हैं। उदाहरण के लिए यदि कोई रडार या ड्रोन ऑपरेटर सिग्नल ट्रांसमिट कर रहा है तो उस सिग्नल से उस डिवाइस की फ्रीक्वेंसी रेंज का पता लगाया जा सकता है। यह जानकारी मिलने के बाद उस सिस्टम को ज्यादा असरदार तरीके से जाम किया जा सकता है।

दुश्मन की फ्रीक्वेंसी पर करते हैं फोकस

सिस्टम को बेअसर करने के लिए उन्हीं खास फ्रीक्वेंसी पर फोकस किया जाता है, जिस पर दुश्मन का सिस्टम काम कर रहा होता है। सिग्नल पकड़ने से लेकर विश्लेषण तक की पूरी प्रक्रिया की शुरुआत एंटीना और रिसीवर से होती है। ये रिसीवर अलग-अलग फ्रीक्वेंसी बैंड के सिग्नलों को पकड़ते हैं।  ऐसा इसलिए क्योंकि हर रडार अलग-अलग फ्रीक्वेंसी पर ऑपरेट करता है। सिग्नल पकड़ने के बाद यह एडवांस सिस्टम उसकी कई महत्वपूर्ण विशेषताओं को मापता है। इसमें सिग्नल की फ्रीक्वेंसीपल्स की चौड़ाई (Pulse Width), पल्स के बीच का अंतराल (PRI), एक निश्चित समय में भेजी गई पल्स की संख्या (PRF), सिग्नल आदि शामिल हैं।

कई सिग्नल को अलग-अलग पकड़ सकेगा

किसी भी ऑपरेशनल इलाके में एक साथ कई दुश्मन रडार सक्रिय हो सकते हैं और उनके सिग्नल एक ही समय में रिसीवर तक पहुंच सकते हैं। इन्हें यह नया पोर्टेबल ELINT सिस्टम अलग-अलग पहचान कर एनालाइज करने में सक्षम होगा।

सिग्नल को कैसे पहचानेगा नया ELINT सिस्टम

रडार सिग्नलों को अलग-अलग करने की इस प्रक्रिया को 'डीइंटरलीविंग' (Deinterleaving) कहा जाता है। यह पूरी प्रक्रिया फ्रीक्वेंसी, पल्स के बीच के समय अंतराल और अन्य इनबिल्ट विशेषताओं पर आधारित होती है। इसके लिए आधुनिक सिस्टम में डिजिटल प्रोसेसिंग और मशीन लर्निंग जैसी एडवांस तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है।अलग किए गए प्रत्येक सिग्नल की तुलना पहले से मौजूद ज्ञात रडार सिग्नेचर की एक लाइब्रेरी से की जाती है। इस मिलान से सिस्टम आसानी से यह पता लगा लेता है कि सामने किस प्रकार के रडार का उपयोग हो रहा है। जैसे कि सर्च रडार, ट्रैकिंग रडार या फायर कंट्रोल रडार।

तीनों तरह के रडार का अलग-अलग काम

इनमें सर्च रडार लक्ष्यों की खोज के लिए एक बड़े क्षेत्र को स्कैन करता है। ट्रैकिंग रडार किसी एक विशेष लक्ष्य पर लगातार नजर रखता है, जबकि फायर कंट्रोल रडार हथियारों को गाइड करने में मदद करता है।

पोर्टेबल सिस्टम क्यों है रणनीतिक रूप से जरूरी

ऐसे सिस्टम का पोर्टेबल होना, यानी एक जगह से दूसरी जगह आसानी से ले जाने योग्य होना, बेहद महत्वपूर्ण है। खासकर पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में जहां बड़े वाहनों या स्थायी निगरानी उपकरणों को तैनात करना मुश्किल होता है। एक छोटा और कॉम्पैक्ट सिस्टम बड़े प्लेटफॉर्म के संसाधनों पर निर्भर हुए बिना ही फील्ड यूनिट्स को दुश्मन की इलेक्ट्रॉनिक गतिविधियों की सटीक जानकारी दे सकता है। अब जबकि जब ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है, ऐसे ELINT सिस्टम ड्रोन ऑपरेटर की सटीक लोकेशन ट्रेस करने में मददगार साबित हो सकते हैं। साथ ही, ये दुश्मन के ड्रोन के करीब आने की अर्ली वार्निंग भी दे सकते हैं। इससे हमारी सेनाओं को काउंटर-ड्रोन कार्रवाई शुरू करने के लिए अतिरिक्त समय मिल जाता है।

लोकेशन ट्रेसिंग और खतरे का आकलन

यह सिस्टम सिग्नल के सोर्स यानी उसके आने की जगह का भी सटीक अनुमान लगा सकता है। यदि अलग-अलग लोकेशन पर लगे सेंसर एक ही सिग्नल को पकड़ते हैं, तो उनकी रीडिंग को मिलाकर सिग्नल की उत्पत्ति वाली जगह का पता लगाया जा सकता है। इसके लिए 'ट्रायंगुलेशन' (Triangulation) और रडार तरंगों के पहुंचने के समय में अंतर जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है।

डिजिटली एनालाइज करते हैं सिग्नल को

विभिन्न डिजिटल तकनीकें फ्रीक्वेंसी के आधार पर सिग्नल का गहराई से विश्लेषण करने में मदद करती हैं। एक बार सिग्नल की पहचान हो जाने के बाद सिस्टम खतरे के स्तर का आकलन करता है। रडार के सिग्नल में आया कोई भी बदलाव इस बात का संकेत दे सकता है कि उसके ऑपरेशनल मोड में बदलाव आया है।

DRDL प्रोजेक्ट के तीन अहम चरण

Defence Electronics Research Laboratory (DLRL) के इस प्रोजेक्ट को तीन अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया है। पहला है डेवलपमेंट (विकास), दूसरा- इंटीग्रेशन (एकीकरण) और तीसरा है- क्वालिफिकेशन (योग्यता परीक्षण)। डेवलपमेंट में उपकरण और उसके सभी मॉड्यूल्स का निर्माण शामिल है। इंटीग्रेशन में इस चरण में सभी अलग-अलग हिस्सों को जोड़कर एक पूरी तरह से काम करने वाला सिस्टम तैयार किया जाता है। क्वालिफिकेशन में इस अंतिम चरण में सिस्टम को कड़े तकनीकी और पर्यावरणीय मानकों पर परखा जाता है। इनमें तापमान, नमी, कंपन, झटके और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंटरफेरेंस शामिल हैं।

Puneet Pandey
By Puneet Pandey

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