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Peoples Update Special :मुख्यमंत्री का किस्सा- नेहरू के विरोध पर कांग्रेस से बाहर हुए; एक साथ तीन चुनाव हारने का रिकॉर्ड, विधायकों की किडनैपिंग के बाद सीएम बने डीपी मिश्र

मप्र के मुख्यमंत्रियों में द्वारका प्रसाद मिश्र (डीपी मिश्र) चाणक्य के रूप में जाने जाते हैं। कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू का विरोध किया। पार्टी से बाहर हुए तो अपनी पार्टी बना ली। एक साथ तीन जगह से चुनाव लड़े लेकिन हर सीट से हार गए। इसके बावजूद उन्हें कांग्रेस से ही मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला। मिश्र की जयंती 5 अगस्त पर पढ़िए उनसे जुड़े किस्से...
 नेहरू के विरोध पर कांग्रेस से बाहर हुए; एक साथ तीन चुनाव हारने का रिकॉर्ड, विधायकों की किडनैपिंग के बाद सीएम बने डीपी मिश्र
फाइल फोटो

नरेश भगोरिया, भोपाल। मप्र की राजनीति में 1963 में द्वारका प्रसाद मिश्र का मुख्यमंत्री बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम माना जाता है जब उन्होंने हाईकमान की इच्छा के विरुद्ध ऐसी रणनीति बनाई की पार्टी को उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपनी पड़ी। दरअसल, मप्र के दूसरे चुनाव 1962 में हुए और कांग्रेस 288 में से सिर्फ 142 सीट ही जीत पाई। सीएम कैलाशनाथ काटजू खुद चुनाव हार गए थे। ऐसे में खंडवा के भगवंत राव मंडलोई को कार्यवाहक मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन 18 महीने बाद ही कांग्रेस का कामराज प्लान आने के कारण उन्हें हटना पड़ा। हाईकमान काटजू को फिर सीएम बनाने की तैयारी में था लेकिन मिश्र ने ऐसी चाल चली कि 1963 में उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। 

काटजू और जैन को ऐसे दी मात

1963 में कामराज प्लान के तहत केंद्रीय मंत्री एवं मुख्यमंत्रियों से इस्तीफा ले लिया गया था। मप्र से भी सीएम भगवंत राव मंडलोई को हटना पड़ा। तब हाईकमान कैलाशनाथ काटजू को सीएम बनाना चाहता था। हालांकि काटजू चुनाव हार गए थे और डीपी मिश्र कसडोल से चुनाव जीतकर आए थे। यहीं से मिश्र ने सीएम बनने की रूपरेखा तैयार की। मिश्र जानते थे कि काटजू का विरोध होगा तो उन्होंने खुद घोषणा की कि काटजू आम सहमति से चुने जाते हैं तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं, लेकिन चुनाव होते हैं तो वे भी एक उम्मीदवार होंगे।

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सागर में गुप्त स्थान पर रखे गए विधायक

विधायक दल का नेता चुनने के लिए मिश्र का मुकाबला तखतमल जैन से था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद शुक्ल ने अपनी किताब क्षितिज का विस्तार में लिखा है कि ‘विधायक दल का चुनाव जीतने के लिए बड़ी जोरआजमाइश हुई, विधायकों की किडनैपिंग तक करनी पड़ी। विधायकों के अपहरण की यह पहली घटना थी। मिश्र की तरफ से 18 से 20 विधायकों को सागर में गुप्त स्थान पर रखा गया। चुनाव का वक्त आने पर उन्हें सड़क मार्ग से भोपाल लाया गया।’ भोपाल के विधायक विश्रामगृह के खंड दो के सभाकक्ष में मतदान कराया गया। बीजू पटनायक कांग्रेस के पर्यवेक्षक थे। मिश्र को 83 और तखतमल जैन को 64 वोट मिले। मिश्र को 29 सितंबर 1963 को मप्र का मुख्यमंत्री घोषित किया गया।

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मिश्र के राज में पहली बार 24 विधायकों ने पाला बदला

मिश्र के सत्ता संभालने के बाद जब चुनाव हुए तो कांग्रेस 170 सीटें जीतकर आई। मिश्र के उसी कार्यकाल में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के 24 विधायकों ने कांग्रेस का दामन थाम लिया। मिश्र के समय प्रदेश में 12 उपचुनाव हुए उनमें से 9 कांग्रेस ने जीते थे। वहीं प्रदेश की 48 नगर पालिकाओं के चुनाव हुए तो 38 में कांग्रेस की जीत हुई।

पं. नेहरू से इसलिए था विरोध

द्वारका प्रसाद मिश्र जब मध्य प्रांत के गृह मंत्री थे तब पं. नेहरू की पाकिस्तान व चीन की नीतियों का विरोध किया। पं. नेहरू का विरोध करने के कारण ही उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। पार्टी छोड़ते वक्त उन्होंने 14 पन्ने में पं. नेहरू पर आरोप लगाए। उन्होंने भविष्यवाणी की कि नेहरू की नीतियों के कारण एक दिन चीन और पाकिस्तान भारत पर हमला करेंगे। वे करीब 12 वर्ष पार्टी से बाहर रहे और 1963 में उनकी वापसी हुई।

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हार का रिकॉर्ड, विधानसभा ही नहीं, कुलपति का चुनाव भी हारे

कांग्रेस छोड़ने के बाद द्वारका प्रसाद मिश्र ने अपनी पार्टी बनाई, नाम था-भारतीय लोक कांग्रेस। मिश्र अपनी पार्टी से जबलपुर, छिंदवाड़ और नागपुर तीन सीट से चुनाव लड़े, लेकिन तीनों ही जगह उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 1954 में वे मंडला से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर मंडला से उपचुनाव लड़े लेकिन उसमें भी हार गए। हालांकि इलेक्शन पिटीशन में मिश्र के पक्ष में फैसला आया। 1955 में डीपी मिश्र ने सागर विश्विद्यालय के कुलपति पद का चुनाव लड़ा, लेकिन इतिहास के विद्वान डॉ. रामप्रसाद त्रिपाठी से हार गए। हालांकि मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल ने डॉ. त्रिपाठी का निर्वाचन तकनीकी आधार पर रद्द कर दिया। दोबारा चुनाव कराने से पहले 16 नए सदस्य कार्य परिषद में नामित किए गए। रविशंकर शुक्ल खुद सागर में जमे रहे और इस चुनाव में मिश्र सागर विश्विद्यालय के कुलपति चुने गए।

लाइफस्टाइल से किया प्रभावित

द्वारका प्रसाद मिश्र की लाइफस्टाइल हरकिसी का ध्यान खींचती थी। वरिष्ठ पत्रकार तरुण कुमार भादुड़ी ने अपनी पुस्तक ऑफ द रिकॉर्ड में मिश्र के बारे में लिख कि-अच्छे कपड़े पहनने के शैकीन मिश्र, समय के पाबंद थे और दिन की शुरुआत लजीज नाश्ते के साथ करते थे। बिना अपॉइन्टमेंट दिए किसी से नहीं मिलते थे। अगर कोई महिला उनके पास आती तो उसका स्वागत खड़े होकर करते थे। मिश्र को किसी ने नाक से तेज आवाज करते व सड़क पर थूकते हुए नहीं देखा। वातानुकूलित घर और ऑफिस उनकी पहली पसंद थे। मिश्र जब मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने क्रेविन ए सिगरेट पीना छोड़कर सिगार पीना शुरू कर दिया था।


Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...

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