Delhi Liquor Scam Case :केजरीवाल बोले- जस्टिस शर्मा 4 बार RSS के प्रोग्राम में शामिल हुई, उन्हें हटाने की 7 वजह भी गिनाई

नई दिल्ली। शराब घोटाला मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में सोमवार को सुनवाई के दौरान अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा से खुद को मामले से अलग (रिक्यूज) करने की मांग दोहराई। करीब डेढ़ घंटे तक अपनी दलीलें रखते हुए केजरीवाल ने कहा कि उन्हें पहले से ही दोषी माना जा रहा है और अदालत के आदेशों में एक पैटर्न दिखाई देता है, जिसमें जांच एजेंसियों के पक्ष को लगातार स्वीकार किया जा रहा है।
जज के आदेशों पर उठाए सवाल
केजरीवाल ने कहा कि कोर्ट के फैसलों में ऐसा रुझान दिखता है, जहां ED और CBI की दलीलों को प्राथमिकता मिलती है। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना उनकी बात सुने ही ट्रायल कोर्ट के फैसले को “पहली नजर में गलत” बताया गया, जिससे उन्हें पक्षपात की आशंका हुई।
‘एप्रूवर’ और सुनवाई प्रक्रिया पर आपत्ति
उन्होंने कहा कि पहले अदालत ने ‘एप्रूवर’ (गवाह बने आरोपी) के बयानों को मान्य माना था, लेकिन बाद में बेहद कम समय की सुनवाई में ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियों को गलत ठहरा दिया गया। केजरीवाल के मुताबिक, यह बदलाव उनके लिए चिंता का विषय है और इससे न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं।
सत्येंद्र जैन केस का दिया हवाला
केजरीवाल ने सत्येंद्र जैन से जुड़े मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी पक्षपात की आशंका के आधार पर जज बदले गए थे। उन्होंने कहा कि यहां सवाल जज की ईमानदारी का नहीं, बल्कि पक्षकार के मन में उत्पन्न आशंका का है, जो उनके मामले में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
केजरीवाल ने गिनाई 7 बड़ी वजह
- उन्होंने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने जांच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की बात कही थी, लेकिन हाईकोर्ट ने उसे रोक दिया, जबकि अधिकारी ने खुद कोई राहत नहीं मांगी थी। इससे भी उनके मन में निष्पक्षता को लेकर शंका पैदा हुई।
- एकतरफा आदेश और प्रक्रिया पर आपत्ति
केजरीवाल ने आरोप लगाया कि बिना उन्हें सुने ही ट्रायल कोर्ट के आदेश के अहम हिस्सों पर रोक लगा दी गई और फैसला लगभग बदल दिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें CBI की याचिका की कॉपी तक समय पर नहीं दी गई, जो न्यायिक प्रक्रिया के खिलाफ है। - तेजी से सुनवाई पर उठाए सवाल
उन्होंने कहा कि इस केस और इससे जुड़े अन्य मामलों, जैसे मनीष सिसोदिया के मामलों की सुनवाई असामान्य रूप से तेजी से हो रही है, जबकि अन्य मामलों में ऐसा नहीं होता। इससे भी पक्षपात की आशंका मजबूत होती है। - एजेंसियों की दलीलों को तरजीह का आरोप
केजरीवाल के अनुसार, अदालत में ED और CBI की लगभग हर दलील को स्वीकार कर लिया जाता है। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट के विस्तृत फैसले के खिलाफ CBI ने बहुत कम समय में याचिका दाखिल की, फिर भी पहली ही सुनवाई में एजेंसी के पक्ष में आदेश दे दिया गया। - पिछले मामलों का भी किया जिक्र
उन्होंने कहा कि इसी अदालत में पहले भी इस केस से जुड़े कई मामलों—जैसे संजय सिंह, के कविता और अमन ढल्ल की याचिकाओं पर सुनवाई हुई है, जिनमें अदालत की टिप्पणियां निर्णय जैसी प्रतीत होती हैं। - RSS से जुड़े कार्यक्रमों में भागीदारी पर आपत्ति
केजरीवाल ने यह भी कहा कि जस्टिस शर्मा ‘अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद’ जैसे संगठन के कार्यक्रमों में कई बार शामिल हो चुकी हैं, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा माना जाता है। उन्होंने कहा कि यह मामला राजनीतिक है और ऐसे में किसी विचारधारा से जुड़ाव की आशंका निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती है। - सोशल मीडिया और निष्पक्षता का सवाल
अंत में केजरीवाल ने कहा कि आमतौर पर जब जज के करीबी किसी पक्ष से जुड़े होते हैं, तो वे खुद को मामले से अलग कर लेते हैं। उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि इस पहलू पर भी विचार किया जाए, ताकि उन्हें निष्पक्ष न्याय मिल सके।
CBI ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देगी
CBI ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य 22 आरोपियों को बरी कर दिया गया था। एजेंसी का कहना है कि ट्रायल कोर्ट ने तथ्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और फैसले में कई खामियां हैं।
एजेंसी ने केजरीवाल की याचिका का विरोध किया
इससे पहले CBI ने हाईकोर्ट में हलफनामा दायर कर केजरीवाल की याचिकाओं का विरोध किया था। एजेंसी ने कहा कि ‘अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद’ के एक सेमिनार में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की मौजूदगी का मतलब यह नहीं है कि उनका झुकाव किसी विशेष संगठन की ओर है। इसलिए जज को हटाने की मांग का कोई आधार नहीं बनता।
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ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपियों को जमानत दी
27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में केजरीवाल समेत सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया था। कोर्ट ने अपने फैसले में CBI की जांच पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कई सवाल उठाए थे। हालांकि, बाद में हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस शर्मा ने कहा था कि पहली नजर में ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियां सही नहीं लगती और इस पर विस्तार से विचार जरूरी है।
क्या है आबकारी नीति का पूरा मामला?
दिल्ली सरकार ने 2021 में नई आबकारी नीति लागू की थी, जिसका उद्देश्य राजस्व बढ़ाना और शराब कारोबार में सुधार लाना था। बाद में अनियमितताओं के आरोप लगने के बाद इस नीति को वापस ले लिया गया। इसके बाद उपराज्यपाल विनय सक्सेना ने CBI जांच के आदेश दिए।
जांच एजेंसियों का आरोप है कि इस नीति के जरिए निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया। इस मामले में केजरीवाल को 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान गिरफ्तार किया गया था और वे 156 दिन तक हिरासत में रहे, जबकि सिसोदिया करीब 530 दिन जेल में रहे। बाद में दोनों को राहत मिली, लेकिन अब इस केस की सुनवाई एक बार फिर अहम मोड़ पर पहुंच गई है।











