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डियर डायरी डे: साहित्यकारों ने साझा की डायरी लेखन की यात्रा, डायरी में दर्ज यादों से तैयार हो गए साहित्य और कविता संग्रह

प्रीति जैन, भोपाल। डायरी कोई भी लिख सकता है। डायरी लिखने का मतलब अपने रोजमर्रा के अनुभवों को लिपिबद्ध करना। कई लोगों को लगता है कि रोज डायरी लिखना अनिवार्य होता है। डायरी लिखने में दिनों, सप्ताह और कई बार महीनों का अंतराल हो सकता है। बस जब कोई व्यक्ति डायरी लिख रहा होता है तब यही सोचता है कि यह लिखना सिर्फ उसके अपने लिए है। एक तरह से यह आत्मअवलोकन भी है, लेकिन कई बार इसमें लिखी बातें किसी रचना का रूप भी ले लेती हैं। शहर में भी ऐसे कई साहित्यकार हैं जो कि नियमित रूप से तो कभी अंतराल से डायरी लिखते हैं। नेशनल डियर डायरी डे पर साहित्यकारों ने डायरी को लेकर उनके अनुभव साझा किए। [caption id="attachment_4900" align="aligncenter" width="434"] यतींद्रनाथ राही, वरिष्ठ साहित्यकार[/caption]

95 साल का हूं, 8 से 10 पुस्तकें डायरी से प्रभावित

मुझे डायरी लिखते हुए 60 साल का समय हो गया। 1960 में जब सरकारी स्कूल में टीचर बना था तभी से डायरी लिख रहा हू्ं। लिखते हुए यह नहीं सोचा था कि कभी इससे कोई रचना जन्म लेंगी, लेकिन कालांतर में मेरी 8 से 10 पुस्तकें कहीं न कहीं मेरी डायरी से प्रभावित रहीं, क्योंकि उन रचनाओं के प्रकाशन के दौरान मैंने उनके नीचे वो तिथि भी लिखी। अब मैं 95 साल का हो गया हूं तो रोज तो नहीं, लेकिन याददाश्त के लिए समय-समय पर इसे लिखता हूं। जो बातें किसी से कह नहीं पाते वो इसमें दर्ज होती हैं। - यतींद्रनाथ राही, वरिष्ठ साहित्यकार [caption id="attachment_4901" align="aligncenter" width="355"] डॉ. साधना बलवटे, वरिष्ठ व्यंग्यकार[/caption]

नए विचार व अनुभूति होने पर साप्ताहिक लिखती हूं

मैं अपने अनुभवों व अनुभूतियों को डायरी में दर्ज करती हूं। कुछ ऐसी बातें होती हैं, जिन्हें लेकर नए शब्द और विचार जन्म लेते हैं और उन्हें उसी दिन लिख लेती हूं। जब उसे फिर कभी पढ़ो तो कुछ नया मालूम जान पड़ता है। पुरानी बातें कभी किसी संदर्भ में इस्तेमाल आ जाती हैं। हालांकि यह बहुत ही निजी लेखन होता है, लेकिन बहुत संभव है कि यह किसी रचना में प्रभावित करे। -डॉ. साधना बलवटे, वरिष्ठ व्यंग्यकार [caption id="attachment_4903" align="aligncenter" width="455"] डॉ. लता अग्रवाल, वरिष्ठ साहित्यकार[/caption]

21 साल हो गए पिता को याद करके लिखते हुए

जब 13 साल की तभी से डायरी लिख रही हूं। पिता की मृत्यु के बाद जो त्रासदी मेरे परिवार ने झेली उसका दुख किसी से साझा नहीं कर सकती थी, क्योंकि इस उम्र में परिवार की मुखिया बन चुकी थी। हर दिन पापा को संबोधित करते हुए डायरी लिखती और सारा दर्द उसमें उतार देती। 1011 कविताएं हस्ताक्षर हैं। पिता, मेरी डायरी से निकला संग्रह है। -डॉ. लता अग्रवाल, वरिष्ठ साहित्यकार
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