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दरगाह परिसर केस : मप्र हाईकोर्ट से वक्फ कमेटी की याचिका खारिज, कॉस्ट लगाई

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने मोरीवाले बाबा दरगाह से जुड़े मामले में दायर याचिका को निराधार मानते हुए वक्फ कमेटी की याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस संदीप एन. भट्ट की सिंगल बेंच ने याचिकाकर्ता पर 15 हजार रुपए की कॉस्ट भी लगाई।
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 मप्र हाईकोर्ट से वक्फ कमेटी की याचिका खारिज, कॉस्ट लगाई
फाइल फोटो

इंदौर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने मोरीवाले बाबा दरगाह से जुड़े मामले में दायर याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया। जस्टिस संदीप एन. भट्ट की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता पर 15 हजार रुपए की कॉस्ट भी लगाई और निर्देश दिया कि यह राशि सात दिनों के भीतर इंदौर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन में जमा कर उसकी रसीद न्यायालय में प्रस्तुत की जाए। याचिका में 16 जून 2026 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें एसडीओ ने सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश-7 नियम-11 के तहत प्रस्तुत आवेदन को खारिज कर दिया था।

पूरा प्रकरण निरस्त करने की थी मांग

याचिकाकर्ता ने पूरे प्रकरण को निरस्त करने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने 25 सितंबर 1986 के इंदौर विकास प्राधिकरण के पत्र का हवाला देते हुए दावा किया कि उसे 360.21 वर्गमीटर क्षेत्र के उपयोग की अनुमति दी गई थी। हालांकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अनुमति केवल परिसर के उपयोग के लिए थी और उसमें अतिक्रमण या दुरुपयोग नहीं करने की शर्त भी स्पष्ट रूप से दर्ज थी। अदालत ने पाया कि संबंधित परिसर में बाद में 14 दुकानें और अन्य निर्माण कर दिए गए, जबकि इन निर्माणों की कोई वैध अनुमति न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं की गई।

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कार्रवाई का अधिकार कलेक्टर को

याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि मध्य प्रदेश सार्वजनिक स्थान अधिनियम 2001 के तहत आवश्यक जांच पूरी किए बिना कार्रवाई की जा रही है। पहले से नगर निगम को कार्रवाई के निर्देश दिए जा चुके हैं। वहीं राज्य सरकार और केविएटर की ओर से दलील दी गई कि इसमें वर्ष 2001 का अधिनियम लागू होता है। इस अधिनियम के तहत कलेक्टर को जांच और कार्रवाई का अधिकार प्राप्त है। साथ ही यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता के पास संपत्ति पर स्वामित्व का कोई वैध दस्तावेज नहीं है और न ही समिति की ओर से याचिका दायर करने का अधिकृत प्राधिकरण पत्र प्रस्तुत किया गया।

जांच रोकने के लिए दायर की गई याचिका

हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि संबंधित प्रकरण की जांच पहले से जारी है और याचिकाकर्ता विभिन्न आधारों पर उस प्रक्रिया को विलंबित करने का प्रयास कर रहा है। अदालत ने माना कि एसडीओ द्वारा आवेदन को खारिज करने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। पीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने न तो संपत्ति पर अपना अधिकार स्थापित किया और न ही यह साबित किया कि उसे समिति की ओर से याचिका दायर करने का वैध अधिकार प्राप्त है। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि इस प्रकार की याचिकाएं संबंधित प्राधिकरण और न्यायालय दोनों का बहुमूल्य न्यायिक समय नष्ट करती हैं।

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Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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