Download App
Download on the App StoreGet it on Google Play
Breaking News

कॉकरोच बनेगा ‘रेस्क्यू एजेंट’! मलबे में दबे लोगों को खोजेंगे साइबॉर्ग कीड़े, जरूरत पड़ने पर देंगे दवा

ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों ने कॉकरोच को साइबॉर्ग रेस्क्यू एजेंट में बदलने का प्रयोग किया है। माइक्रोचिप और इलेक्ट्रोड की मदद से इन्हें रिमोट से नियंत्रित किया जा सकता है। ये मलबे में फंसे लोगों को खोजने और जरूरत पड़ने पर दवा पहुंचाने में मदद कर सकते हैं।
कॉकरोच बनेगा ‘रेस्क्यू एजेंट’! मलबे में दबे लोगों को खोजेंगे साइबॉर्ग कीड़े, जरूरत पड़ने पर देंगे दवा
अब कॉकरोच करेंगे रेस्क्यू!

कैनबरा। आपदा की स्थिति में छोटे रोबोट और ड्रोन जिन कामों को अंजाम दे सकते हैं वो कि कोई बड़ा उपकरण शायद ही कभी कर सके। ये जिन मकसद से बनाए गए थे उनसे आगे जाकर हमारी मदद कर रहे हैं। इनका उपयोग तब समाने आता है जब हमारा सामना प्राकृतिक आपदाओं से होता है और जब राहत कार्य करने में जुटे लोग मलबे में या जमीन के नीचे दबे लोगों को खोज रहे होते हैं। ऐसे समय में सबसे बड़ी दिक्कत मलबे में दबे लोगों को खोजने में होती है। तब, छोटे रोबोट या उपकरण बहुत छोटी जगहों से रेंगकर निकल सकते हैं और पीड़ित, फंसे हुए लोगों को खोज ज्यादा तेजी से मदद पहुंचाने में सहायक हो सकते हैं। 

/img/15/1789645713231

नई रिसर्च से पता चलता है कि कीड़ों के अगली पीढ़ी के फर्स्ट रिस्पॉन्डर (आपदा के समय सबसे पहले मदद करने वाले) के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। ये मलबे में बहुत छोटे रस्तों से भी रेंगकर निकल सकते हैं, इनकी यही खूबी यूनीक बनाती है।

ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड और यूनिवर्सिटी ऑर न्यू साउथ वेल्स की शोध टीम ने पैराबोर्ग (Paraborg- इंसानों की देखरेख वाला पैरामेडिक साइबॉर्ग-कीट प्लेटफॉर्म)  तैयार किए हैं। यह  किसी प्राकृतिक आपदा में फंसे पीड़ितों को न केवल खोज सकता है बल्कि उन्हें प्राइमरी ट्रीटमेंट (जैसे जरूरी दवा) देने में भी सक्षम है। यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड की रिसर्चर टैन वो डोन (बायो-रोबोटिक्स) ने जानकारी दी कि पिछले कुछ दशकों से खोज कर रेस्क्यू मिशन में मदद के लिए साइबॉर्ग कीड़े तैयार किए जा रहे हैं।

UFO या अमेरिका की सीक्रेट वॉर मशीन? Lockheed Martin के Vectis ने बढ़ाई हलचल

कॉकरोच से मिला आइडिया

पैराबोर्ग को डेवलप करने के लिए टीम ने उत्तरी क्वींसलैंड के एक बिल बनाने वाले कॉकरोच का सहारा लिया। यह कॉकरोच 3.5 इंच तक लंबा और 40 ग्राम तक वजन वाला होता है। इस कॉकरोच के आकार से शोधकर्ताओं ने दो तरह के पैराबोर्ग तैयार किए। दोनों ही आपदा के समय मदद के लिए तैयार किए गए हैं। एक को फिल्मिंग के लिए तैयार किया गया है तो दूसरे को दवा देने के लिए ऑटोमैटिक इंजेक्शन सिस्टम ( आकार में बहुत छोटा ) से लैस किया गया। इंजेक्शन सिस्टम को कॉकरोच के ऊपर फिट किया गया। इस बारे में उन्होंने एडवांस्ड साइंस में प्रकाशित एक पेपर में जानकारी दी है।

/img/15/1789645783235

कैसे तैयार किए साइबॉर्ग कॉकरोच?

साइबॉर्ग कॉकरोच बनाने के लिए कॉकरोचों को बेहोश कर उनमें इलेक्ट्रोड और माइक्रोचिप लगाए गए। इसमें खास बात यह थी कि उपकरण हटाए जाने के बाद वे सामान्य कॉकरोच की तरह बने रहे।  इन बदलावों से रिसर्चर कॉकरोच को दूर से ही कंट्रोल कर सके। उन्होंने कॉकरोच के एंटीना और सर्सी (पेट के पिछले हिस्से में निकले हुए सेंसरी ऑर्गन) में लगे इलेक्ट्रोड को इलेक्ट्रिक सिग्नल दिए जिससे वे उसकी चलने की स्पीड और डायरेक्शन को कंट्रोल कर सके।

समंदर में चीन की नई चाल! 205 मीटर के 'मदरशिप' से दूर तक भेजे जाएंगे अंडरवॉटर ड्रोन

इतना ही नहीं उनका कॉकरोच पर ऐसा कंट्रोल था कि वे उसकी चलने की दिशा को बदल सकते थे। एंटीना को दिया सिग्नल दिशा, तो सर्सी को दिया सिग्नल उसकी चलने की स्पीड को कंट्रोल करता है। कॉकरोच के रिमोट कंट्रोल के लिए 10 से 40 हट्रर्ज की फ्रीक्वेंसी का प्रयोग किया गया। 

इस तरह दे सकता है जरूरी दवा

इंजेक्शन लगाने वाली प्रणाली एक छोटे उपकरण से बनी है। यह एक कैमिकल रिएक्शन, स्प्रिंग सिस्टम और सिरंज को मिलाकर बने हैं। कैमिकल रिएक्शन से स्प्रिंग एक्टिव हो जाती है जिससे सिरंज का प्लंजर (पिछला हिस्सा जिसे प्रेस करने पर दवा निकलती है) एक्टिव हो जाता है और दवा पीड़ित को दी जा सकती है। अपने प्रॉसेस की पुष्टि के लिए 
शोधकर्ताओं ने एक कॉकरोच को रिमोट से कंट्रोल करके तीन चेकपॉइंट्स से निकालते हुए एक टरगेट पॉइंट तक पहुंचाया और उसे इंजेक्शन लगवाया। इस एक्सपेरिमेंट में सामने आया कि  टारगेट के पास से इंजेक्शन लगाने की सफलता दर लगभग 95% रही।

पूरे प्रॉसेस की एक्यूरेसी अभी 72% थी। रिसर्चर्स ने एक कॉकरोच कैमरे का प्रयोग कर  नकली टारगेट को खोजा और दूसरे से उसे इंजेक्शन लगवाया। रिसर्चर वो डोन को भरोसा है कि अगले 10 सालों में ऐसे साइबॉर्ग की टीम तैयार जा सकती है जो बचाव कार्य में मदद कर सके।

Shivani Gupta
By Shivani Gupta

शिवानी गुप्ता | MCU, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ग्रेजुएशन | 9 वर्षों की टीवी और डिजिटल तक की य...Read More

Latest Posts