चीन के 4 KJ-3000 AEW&C विमान सैटेलाइट तस्वीरों में दिखे, सीरियल प्रोडक्शन के संकेत

वॉशिंगटन। नई सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि चीन के चार KJ-3000 एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) विमान, शीआन-यानलिआंग में शीआन एयरक्राफ्ट कंपनी की फैक्ट्री में मौजूद हैं। इससे यह संभावना बनती है कि इस विमान का अब बड़े पैमाने पर उत्पादन (सीरियल प्रोडक्शन) शुरू हो रहा है। 5 अक्टूबर को ली गई और वैंटर (Vantor) द्वारा उपलब्ध कराई गई इन तस्वीरों में, तीन KJ-3000 विमान फैक्ट्री के पास और चौथा विमान पास ही स्थित 'चाइना फ्लाइट टेस्ट एस्टेब्लिशमेंट' में दिखाई दे रहा है।
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विमान में चीन में बने इंजन का इस्तेमाल किया गया
अमेरिका स्थित थिंक टैंक 'मिचेल इंस्टीट्यूट फॉर एयरोस्पेस स्टडीज' का मानना है कि चार विमानों की मौजूदगी सीरियल प्रोडक्शन की ओर इशारा करती है। KJ-3000, जिसे KJ-20 भी कहा जाता है, चार इंजन वाले Y-20B ट्रांसपोर्ट विमान पर आधारित है और इसमें चीन में बने इंजनों का इस्तेमाल किया गया है। इसके पिछले हिस्से (फ्यूजलेज) के ऊपर एक बड़ा गोलाकार 'रेडोम' (रडार कवर) लगा है, और कॉकपिट के ऊपर हवा में ईंधन भरने के लिए एक 'प्रोब' मौजूद है। दिसंबर 2024 में इसकी कुछ धुंधली तस्वीरें सामने आई थीं, और मई 2025 में अधिक स्पष्ट तस्वीरें देखने को मिलीं।इसे चीन के मौजूदा बड़े AEW&C बेड़े की कमियों को दूर करने के लिए बनाया गया है, क्योंकि रूस के Il-76MD विमान पर आधारित केवल चार KJ-2000 विमान ही अब तक तैयार हो पाए हैं। पेंटागन की 2025 की एक रिपोर्ट में, जो चीन की सेना पर केंद्रित है, KJ-3000 की पहली उड़ान का जिक्र किया गया है।
चीन के पास 70 ऐसे विमान
वर्तमान में, चीनी सशस्त्र बलों के पास लगभग 70 AEW&C विमान हैं, जो वायु सेना और नौसेना के बीच बंटे हुए हैं। इनमें सबसे बड़ी संख्या छोटे KJ-500 विमानों की है। KJ-500 विमान, Y-9 ट्रांसपोर्ट विमान पर आधारित है, जो खुद सोवियत An-12 विमान पर आधारित है।
भारत के पास पर्याप्त संख्या नहीं
भारत का अपना एयरबोर्न अर्ली वार्निंग बेड़ा काफी छोटा है। सबसे पहले, इजराइल और रूस के साथ 2004 में हुए एक समझौते के तहत, रूसी निर्मित Il-76 विमानों पर इजराइली 'फाल्कन' (Phalcon) सिस्टम लगाए गए थे। इसके तहत तीन सिस्टम मिलने थे। पहला विमान 2009 में सेवा में शामिल हुआ, और अगले दो वर्षों में बाकी दो विमान भी आ गए। इसका घूमने वाला रेडोम 360-डिग्री कवरेज देता है। लेकिन केवल तीन विमानों के जरिए उत्तरी और पश्चिमी हवाई क्षेत्र में लगातार निगरानी (कवरेज) बनाए रखना संभव नहीं है।
बालाकोट एयरस्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान किया इस्तेमाल
स्वदेशी 'नेत्रा Mk I' को DRDO के 'सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स' (CABS) द्वारा ब्राजीलियाई 'एम्ब्रेयर EMB-145' विमान पर विकसित किया गया था। इसके ऊपरी हिस्से (डोरसल रेडोम) में लगा स्वदेशी AESA रडार लगभग 240 डिग्री का कवरेज देता है। निगरानी उपकरणों के साथ पहला विमान 2011 में उड़ा था। भारतीय वायु सेना (IAF) को अपना पहला 'नेत्रा' 2017 में, दूसरा 2019 में और तीसरा 2023 में मिला। 25 जून 2026 को अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनिक-सपोर्ट उपायों और रडार-वार्निंग रिसीवरों को शामिल करने के बाद DRDO ने 'फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरेंस' (FOC) प्रमाणपत्र सौंप दिया। इन विमानों का इस्तेमाल बालाकोट एयरस्ट्राइक और 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान किया गया था।
संख्या बढ़ाने के लिए की जा रही कोशिश
अक्टूबर 2026 तक भारतीय वायु सेना के पास तीन फाल्कन और तीन नेत्रा Mk I विमान हैं। वायु सेना को ऐसे कम से कम 18 विमानों (प्लेटफॉर्म) की जरूरत है। अगला कदम 'नेत्रा Mk II' है, जिसे एयर इंडिया से लिए गए छह एयरबस A321 विमानों पर तैयार किया जा रहा है। जुलाई 2026 में DRDO के 'सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स' (CABS) ने इन विमानों को सैन्य उपयोग के लायक बनाने के लिए 'AI इंजीनियरिंग सर्विसेज लिमिटेड' के साथ एक अनुबंध किया। इसके अलावा, मिशन सिस्टम के लिए अडानी डिफेंस सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजीज को विकास और उत्पादन भागीदार (development-cum-production partner) बनाया गया है।
जरूरी बदलाव किए जाएंगे फिर भारतीय टीम करेगी परीक्षण
एयरबस डिफेंस एंड स्पेस इन विमानों में जरूरी बदलाव करके उन्हें सौंपेगी, जिसके बाद भारतीय टीम इनमें उपकरणों को लगाएगी और उनका परीक्षण करेगी। इसके अलावा जनवरी 2026 में भारतीय वायु सेना ने छह और AEW&C विमानों के लिए जानकारी मांगी (RFI जारी की)। इन विमानों में कम से कम 10 घंटे तक उड़ान भरने की क्षमता (या हवा में ईंधन भरने की सुविधा) होनी चाहिए। ये अधिक ऊंचाई पर काम करने में सक्षम होने चाहिए और इनमें 360-डिग्री रडार कवरेज होना चाहिए।




















