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Raipur:राष्ट्रपति के हाथों अनूप रंजन पांडेय को संगीत नाटक अकादमी सम्मान, छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को मिला राष्ट्रीय मंच

चार दशक की साधना का सम्मान, पांडेय ने पुरस्कार आदिवासी कलाकारों और प्रदेश की जनता को किया समर्पित,नई दिल्ली में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने देश के विभिन्न हिस्सों से आए कलाकारों को सम्मानित किया। अनूप रंजन पांडेय को लोक और जनजातीय संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन में उनके लंबे योगदान के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया।
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राष्ट्रपति के हाथों अनूप रंजन पांडेय को संगीत नाटक अकादमी सम्मान, छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को मिला राष्ट्रीय मंच

प्रेम कुमार, रायपुर: छत्तीसगढ़ की लोक एवं जनजातीय संस्कृति को देश-दुनिया के मंच तक पहुंचाने वाले वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी और पद्मश्री सम्मानित अनूप रंजन पांडेय को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया। नई दिल्ली में आयोजित सम्मान समारोह में मिले इस राष्ट्रीय सम्मान को पांडेय ने छत्तीसगढ़ के आदिवासी कलाकारों और प्रदेश की जनता को समर्पित किया। चार दशक से अधिक समय की सांस्कृतिक साधना, हजारों लोक प्रस्तुतियों, लोकगीत-गाथाओं और दुर्लभ लोकवाद्यों के संरक्षण तथा बस्तर में ‘बंदूक छोड़ो, ढोल पकड़ो’ जैसे शांति संदेश के लिए उन्हें यह सम्मान मिला है।

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राष्ट्रपति के हाथों सम्मान, छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ा

नई दिल्ली में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने देश के विभिन्न हिस्सों से आए कलाकारों को सम्मानित किया। अनूप रंजन पांडेय को लोक और जनजातीय संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन में उनके लंबे योगदान के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। सम्मान मिलने के बाद पांडेय ने इसे अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि न बताते हुए छत्तीसगढ़ के लोक एवं आदिवासी कलाकारों की सामूहिक साधना का सम्मान बताया। राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि सम्मानित कलाकार भारत का ऐसा सांस्कृतिक मानचित्र प्रस्तुत करते हैं, जिसमें देश की मिट्टी की कथाएं, गीत, नृत्य, उत्सव, भाषाएं और बोलियां समाहित हैं। उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा और लोक-जनजातीय कलाओं के संरक्षण की जरूरत पर भी जोर दिया।

नौ साल की उम्र से शुरू हुआ रंगमंच का सफर

21 जुलाई 1965 को बिलासपुर में जन्मे और जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम कोसा से जुड़े अनूप रंजन पांडेय ने बेहद कम उम्र में रंगमंच की दुनिया में कदम रखा। नाचा और रहस लोकनाट्य से प्रभावित पांडेय ने नौ वर्ष की उम्र में रेलवे स्कूल, बिलासपुर के मंच से पहली औपचारिक प्रस्तुति दी। लोकसंगीत, अभिनय और निर्देशन की प्रारंभिक शिक्षा उन्हें अपनी माता एवं गुरु स्व. मनोरमा पाण्डेय और पिता एवं गुरु स्व. राधेश्याम पाण्डेय से मिली। आगे चलकर उन्होंने अपने बड़े भाई एवं अभिनेता आलोक रंजन पाण्डेय से अभिनय की बारीकियां सीखीं।

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3000 से ज्यादा नुक्कड़ नाटक, गांव-गांव पहुंचाया जागरूकता का संदेश

1990 के दशक में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के तहत पांडेय ने गांव-गांव जाकर नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से सामाजिक जागरूकता अभियान चलाया। महिला सशक्तीकरण, पर्यावरण, जनस्वास्थ्य और साक्षरता जैसे मुद्दों पर उन्होंने 3000 से अधिक नुक्कड़ नाटकों में प्रस्तुति दी। इसी दौरान उन्हें पद्मभूषण हबीब तनवीर के ‘नया थिएटर’ के साथ काम करने का अवसर मिला। ‘चरणदास चोर’, ‘मिट्टी की गाड़ी’, ‘आगरा बाजार’, ‘मुद्राराक्षस’, ‘राजरक्त’ और ‘वेणीसंहार’ सहित कई चर्चित नाटकों में उन्होंने अभिनय किया। इन प्रस्तुतियों के सिलसिले में उन्होंने इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और जर्मनी की यात्राएं भी कीं।

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2500 लोकगीत-गाथाएं और 175 लोकवाद्यों का संरक्षण

अनूप रंजन पांडेय ने मंचीय कला तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने छत्तीसगढ़ की मौखिक और वाचिक परंपराओं को संरक्षित करने के लिए व्यापक स्तर पर काम किया। उनके प्रयासों से करीब 2500 लोकगीत, लोकगाथा और लोकवार्ताएं, 150 नाचा के नकल-प्रहसन तथा 175 लोकवाद्यों का संकलन किया गया। राज्य गठन के बाद उन्होंने 80 लोकवाद्य महंत घासीदास संग्रहालय और संस्कृति विभाग को प्रदान किए। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय, भोपाल के लिए भी उन्होंने देशभर से 200 सुषिर लोकवाद्यों का संग्रह किया।

बस्तर बैंड ने बदली संदेश की भाषा ‘बंदूक छोड़ो, ढोल पकड़ो’

बस्तर की पारंपरिक लोकवाद्य संस्कृति से प्रभावित होकर पांडेय ने लगभग डेढ़ दशक पहले आदिवासी कलाकारों के साथ मिलकर ‘बस्तर बैंड’ की स्थापना की। बैंड ने लोकवाद्यों और लोकसंगीत को माध्यम बनाकर हिंसा के खिलाफ ‘बंदूक छोड़ो... ढोल पकड़ो’ अभियान चलाया। इसका उद्देश्य युवाओं को रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ना और बस्तर की लोककला, लोकगीत, लोकगाथा तथा आदिवासी सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण के जरिए शांति का संदेश देना था। इस पहल से 100 से अधिक बिखरी हुई कला मंडलियों को पुनर्गठित किया गया और 5000 से अधिक कलाकारों को सक्रिय मंच मिला। बस्तर बैंड के 11 कलाकारों को राष्ट्रीय और राज्य स्तर के पुरस्कार भी मिल चुके हैं।

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बस्तर की संस्कृति रूस से इटली तक पहुंची

बस्तर बैंड ने छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कला और संगीत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी प्रस्तुत किया। रूस, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका और इटली सहित कई देशों में बस्तर की लोकसंस्कृति की प्रस्तुतियां दी गईं। इस तरह पांडेय ने स्थानीय लोक परंपराओं को केवल संग्रहालयों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें जीवंत मंच और वैश्विक पहचान देने का प्रयास किया।

पद्मश्री समेत कई बड़े सम्मान

अनूप रंजन पाण्डेय को उनकी सांस्कृतिक साधना के लिए वर्ष 2019 में भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया था। इसके अलावा उन्हें दाऊ मंदराजी लोक कला सम्मान, राष्ट्रीय स्वयं सिद्धश्री सम्मान, वरिष्ठ अध्येतावृत्ति सम्मान, टैगोर नेशनल स्कॉलरशिप, राष्ट्रीय तुलसी सम्मान और अन्य प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। वर्ष 2015 में उन्होंने इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से लोक कला में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।

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संगीत नाटक अकादमी से 15 साल जुड़े रहे

पांडेय संगीत नाटक अकादमी, दिल्ली की जनरल कौंसिल के सदस्य के रूप में तीन कार्यकालों में करीब 15 वर्षों तक जुड़े रहे। इसके अलावा संस्कृति मंत्रालय, जोनल कल्चरल सेंटर नागपुर, WIPO-IGC, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़ी विभिन्न समितियों में भी उन्होंने जिम्मेदारियां निभाईं।

लोककला के साथ साहित्य और दस्तावेजीकरण में भी योगदान

पांडेय ने साहित्य और प्रकाशन के क्षेत्र में भी काम किया। राज्य संसाधन केंद्र द्वारा सतत शिक्षा कार्यक्रम के लिए तैयार 114 नवपाठक साहित्य का उन्होंने संपादन किया। इनमें गोंड-परधान चित्रकारी पर आधारित ‘करम देव’ और ‘भगवान का धरती से ग़ायब हो जाना’ जैसी पुस्तकें शामिल हैं।वर्तमान में वे ‘चिन्हारी रंगमंडल’ के निर्देशक और ‘बस्तर बैंड’ के संचालक के रूप में सक्रिय हैं। उनकी पत्नी एवं लोककला मर्मज्ञ अस्मिता पाण्डेय और बेटी अनन्या पाण्डेय भी उनकी सांस्कृतिक यात्रा में सहयोग करती हैं।

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राष्ट्रीय सम्मान से मजबूत हुई छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान

राष्ट्रपति के हाथों मिला संगीत नाटक अकादमी सम्मान अनूप रंजन पांडेय की चार दशक से अधिक लंबी सांस्कृतिक यात्रा की राष्ट्रीय पहचान है। उनके काम ने छत्तीसगढ़ की लोक और आदिवासी परंपराओं को दस्तावेजों, मंचों और अंतरराष्ट्रीय आयोजनों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।



PREM

मै People's Updates रायपुर,छग में CHIEF EDITOR के पद में कार्यरत हूँ।अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत...Read More

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