प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल
गैस सिलेंडर की कमी ने गरीबों और जरूरतमंदों के लिए भोजन की व्यवस्था को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। हालांकि, सामाजिक संस्थाओं की प्रतिबद्धता और सेवा भावना के चलते हालात पूरी तरह बिगड़े नहीं हैं। यह स्थिति एक बार फिर दिखाती है कि संकट के समय समाज की एकजुटता कितनी जरूरी होती है।
सिलेंडर की कमी के चलते कई संस्थाओं ने गैस की खपत कम करने के लिए भोजन के विकल्प बदल दिए हैं। पहले जहां थाली में रोटी, सब्जी, दाल और कभी-कभी हलवा मिलता था, अब उसकी जगह ब्रेड, बिस्किट और सूखा भोजन दिया जा रहा है। हमीदिया अस्पताल के पास सेवा देने वाली संस्थाओं में तो रोटी की जगह कुछ दिन ब्रेड तक परोसनी पड़ी। वहीं हलवा और लड्डू जैसे खाने के सामान पूरी तरह बंद कर दिए गए हैं।

स्थिति से निपटने के लिए संस्थाएं अब डीजल भट्टी, गोकाष्ठ और इंडक्शन जैसे विकल्पों का सहारा ले रही हैं। कुछ जगहों पर सिर्फ रोटी बनाने के लिए ही गैस का उपयोग किया जा रहा है, जबकि बाकी भोजन वैकल्पिक साधनों से तैयार किया जा रहा है। टीटी नगर की अन्नपूर्णा रसोई और अन्य संस्थाएं सीमित संसाधनों में भी लोगों को भोजन उपलब्ध कराने की कोशिश कर रही हैं, ताकि किसी को भूखा न रहना पड़े।
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पीपुल्स समाचार ने शहर की चार अलग-अलग रसोईयों की स्थिति का जायजा लिया। मुश्किल हालात के बावजूद प्रेरणा सेवा ट्रस्ट, राम रोटी योजना, दीनदयाल रसोई जैसी संस्थाएं लगातार लोगों की मदद कर रही हैं। कहीं 1 हजार लोगों को रोज भोजन दिया जा रहा है तो कहीं 250 लोगों को सूखा राशन या फल बांटे जा रहे हैं। संस्थाओं का कहना है कि दिक्कत जरूर है, लेकिन सेवा का काम नहीं रुकेगा। लोगों का सहयोग भी इन संस्थाओं के लिए सहारा बन रहा है।

गैस की कमी का असर होटल और कैंटीन पर भी पड़ा है। कई जगह रोटी की जगह पूड़ी बनाई जा रही है, तो कहीं लकड़ी के चूल्हे का उपयोग शुरू हो गया है। इंडक्शन और डीजल भट्टी की मांग अचानक बढ़ने से इनके दाम भी 5 से 7 गुना तक बढ़ गए हैं। कई दुकानों पर ये उपकरण आउट ऑफ स्टॉक हो चुके हैं, जिससे समस्या और बढ़ गई है।