भरत तिवारी एनकाउंटर मामला:FIR के बाद बढ़ा विवाद, महापंचायत में उठी न्याय की मांग

बिहार के भोजपुर जिले में 17 जून को हुए भरत तिवारी एनकाउंटर मामले ने अब नया मोड़ ले लिया है। करीब एक सप्ताह बाद भरत की मां आशा देवी की शिकायत पर पुलिस अधिकारियों और जवानों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया है। इस कार्रवाई के बाद परिवार ने इसे न्याय की लड़ाई की पहली बड़ी सफलता बताया है, जबकि पूरे मामले को लेकर क्षेत्र में चर्चा और तेज हो गई है। भरत तिवारी की मौत को लेकर शुरू से ही परिवार ने सवाल उठाए थे। परिजनों का आरोप है कि भरत ने पुलिस के सामने हथियार डालकर आत्मसमर्पण कर दिया था, इसके बावजूद उन्हें गोली मारी गई। इस मामले से जुड़ा एक वीडियो भी सामने आया था जिसके बाद एनकाउंटर की परिस्थितियों पर गंभीर सवाल खड़े हुए।
मां की शिकायत पर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ केस
भरत की मां आशा देवी ने पुलिस को दिए आवेदन में तत्कालीन जगदीशपुर एसडीपीओ राजेश कुमार शर्मा, शाहपुर थानाध्यक्ष राजेश कुमार मालाकार समेत अन्य पुलिसकर्मियों पर गंभीर आरोप लगाए थे। शिकायत में कहा गया कि पुलिस भरत को अपने साथ ले गई थी और बाद में गोली लगने की सूचना दी गई। अब इसी आवेदन के आधार पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है। परिवार का कहना है कि भरत को मानसिक रूप से अस्थिर बताकर बदनाम करने की कोशिश की गई, जबकि वह पढ़ा-लिखा युवक था और समाज से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रूप से आवाज उठा रहा था।
विस्थापित परिवारों की आवाज बनकर उभरे थे भरत
परिजनों और समर्थकों के मुताबिक भरत तिवारी बाढ़ और कटाव प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की मांग को लेकर लगातार संघर्ष कर रहे थे। विशेष रूप से जवइनिया गांव के विस्थापित लोगों की समस्याओं को उन्होंने कई मंचों पर उठाया था। इसी कारण वे स्थानीय स्तर पर काफी चर्चित हो गए थे। भरत की मां का आरोप है कि प्रशासन उनकी बात सुनने के बजाय उन्हें दबाने की कोशिश कर रहा था। परिवार का दावा है कि भरत जनहित के मुद्दों को लेकर सक्रिय थे और इसी वजह से कई बार उनका प्रशासन से टकराव हुआ।
महापंचायत में उमड़ी भीड़, न्याय की मांग तेज
भरत तिवारी को न्याय दिलाने के लिए उनके गांव बिलौटी में 36 बिरादरियों की महापंचायत आयोजित की गई। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए और भरत के सामाजिक कार्यों को याद किया। वक्ताओं ने कहा कि भरत ने कटाव पीड़ित परिवारों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और उनकी आवाज बनने का प्रयास किया। महापंचायत में यह मांग भी उठी कि पुनर्वास कॉलोनी का नाम भरत तिवारी के नाम पर रखा जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके संघर्ष को याद रख सकें। कई लोगों ने भरत तिवारी नगर नाम रखने का प्रस्ताव रखा।
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सुरक्षा के कड़े इंतजाम, पुलिस रही अलर्ट
महापंचायत में बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने की संभावना को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए थे। छह से अधिक एसडीपीओ स्तर के अधिकारियों की तैनाती की गई थी। इसके अलावा 300 से ज्यादा महिला और पुरुष पुलिसकर्मी पूरे इलाके में तैनात रहे। कई थानों की पुलिस फोर्स के साथ सादे कपड़ों में भी पुलिसकर्मियों को लगाया गया था। कार्यक्रम स्थल और आसपास के क्षेत्रों की लगातार निगरानी की गई ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से बचा जा सके।
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जांच और कार्रवाई पर टिकी निगाहें
भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद अब पूरे मामले की जांच पर सबकी नजरें टिकी हैं। इस बीच तत्कालीन एसडीपीओ को पद से हटाकर पुलिस मुख्यालय से अटैच कर दिया गया है। प्रशासनिक कार्रवाई और न्यायिक जांच के आगे बढ़ने के साथ यह मामला बिहार की राजनीति और कानून व्यवस्था के लिए भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनता जा रहा है।












